
वाराणसी. आईआईटी बीएचयू, जर्मनी के विशेषज्ञों की मदद से वाराणसी में तैयार करेगा बॉयो गैस प्लांट। किसानों को बताएगा इसके फायदे तथा कैसे इस प्लांट को लाएं उपयोग में। यह जानकारी दी जैविक गैस संगठन, जर्मनी के डॉ रॉबर्ट मुलर, अंत्जे क्रामर, आईआईटी बीएचयू के पूर्व निदेशक प्रो एसएन उपाध्याय और जैव रासायनिक एवं अभियांत्रिकी विभाग के प्रो प्रदीप श्रीवास्तव ने। मीडिया से मुखातिब रॉबर्ट मुलर ने बताया कि बॉयो गैस प्लांट भारत जैसे देश के लिए बहुत ही उपयोगी है। एक तो इससे रोजाना निकलने वाले कचरे का निस्तारण हो जाएगा दूसरे इससे किसानों को कंपोस्ट खाद और बिजली मिल पाएगी। इस सयंत्र से इतनी बिजली पैदा हो सकती है कि उसे पावर ग्रिड को बेचा जा सकता है।
बॉयोगैस प्लांट की उपयोगिता तभी जब कचरों का हो पृथकीकरण
इस मौके पर प्रो श्रीवास्तव ने बताया कि बॉयो गैस प्लांट का निर्माण कठिन नहीं है, कठिन है कचरों का पृथकीकरण और जबतक कचरों का पृथकीकरण नहीं होगा बॉयो गैस प्लांट काम नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा कि इसकी शुरूआत घर से करनी होगी। घर में ही दो तरह के डस्टविन रखने होंगे एक में बॉयो वेस्ट (सब्जी के छिलके, सब्जी का कतरन एव अन्य वानस्पतिक उत्पाद, माला-फूल आदि) और दूसरे डस्टविन में कांच, प्लास्टिक आदि रखना होगा। उन्होंने बताया कि अब तक के प्रयोग में बॉयो गैस प्लांट इसलिए फेल हो रहा है कि कचरे का पृथकीकरण नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि आईआईटी बीएचयू ने जर्मन जैविक गैस संगठन से इसी कारण से कोलेब्रेशन किया है ताकि बनारस और आसपास के इलाके के कचरे का उपयोग किया जा सके। वैसे आईआईटी बीएचयू 2015 से ही इस दिशा में काम कर रहा है।
भारत जैसे देश के लिए है यह ज्यादा जरूरी
प्रो. एसएन उपाध्याय ने बताया कि बॉयो गैस प्लांट भारत के लिए काफी उपयोगी है। इससे जहां मौजूदा ईंधन के उपयोग को कम किया जा सकेगा। वहीं बॉयो गैस प्लांट से जो बिजली और कंपोस्ट बनेगी उसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे जहां हम ऑर्गेनिक खाद पैदा कर सकेंगे वहीं कचरे से बनने वाली बिजली को बेच कर भी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकेंगे। इसी लिहाज से आईआईटी बीएचयू, भारतीय बॉयोगैस एसोसिएशन व जर्मन बॉयोगैस एसोसिएशन के सहयोग से जर्मनी के विशेषज्ञों द्वारा एक प्रयोगशाला स्थापित करने का प्रस्ताव मिला है। इसमें समकालीन परीक्षण सुविधाओं से सुसज्जित उपकरणों से बॉयोगैस के सबस्ट्रेस की संरचना की जाएगी। प्रयोगशाला कंद्वन परीक्षण, सब्सट्रेट के कंदवन पर्यावरण और पोषक तत्वों की आवश्यकताओं का निर्धारण कररना, बॉयोगैस प्रक्रियाओं में संभावित अवरोधों की पहचान करना, टेस्ट के द्वारा पाए गए परिणामों का मूल्यांकन करना, बॉयोगैस संयंत्र के प्रदर्शन सुधारने के लिए सुझाए गए उपायों की चर्चा करके नए और अभिनव संयंत्रों का निर्माण किया जा सकेगा। इसी उद्देश्य से यह 15 दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई है। इस कार्यशाला में पहले एमटेक के विद्यार्थी व शोध छात्र सीखेंगे फिर किसानों के साथ एक वर्कशॉप अलग से होगी।
पारिस्थितिकी तंत्र समाधान के लिए अनुकूल
जर्मन बॉयोगैस एसोसिएशन की अंत्जे क्रामर ने बताया कि बॉयोगैस में अनुसंधान, डिजाइन, विकास और प्रदर्शन जैसी गतिविधियों के लिए पारिस्थितिकी तंत्र समस्या के समाधान के लिए अनुकूल दिखता है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ सहयोग, कार्पोरेट से भागीदार में वृद्धि होने के बाद भी सुधार के लिए काफी गुंजाइश अभी शेष है।