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international mother’s day 2022: ये है ढलती उम्र की माताओं का जज्बा, उम्र का अंतिम पड़ाव फिर भी पढ़ने की हसरतें अपार

international mother's day 2022: बुढ़ापे में इन महिलाओं ने दिखाया ये जज्बा, सीखा ककहरा ताकि कोई न कहे अनपढ़। अब अंगूठा नहीं दस्तखत करती हैं इस गांव की बुजुर्ग महिलाएं। भूल्लनपुर गांव जहां बेसिक व प्रौढ़ शिक्षा की एक साथ देखने को मिल रही मिसाल। सभी का है सपना, हर घर हो साक्षर अपना।

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अन्तर्राष्ट्रीय मातृ दिवस 2022, भुल्लनपुर गांव की बुजुर्ग माता का जज्बा, इस उम्र में सीखा पढ़ना लिखना अब करती हैं सारे काम

अन्तर्राष्ट्रीय मातृ दिवस 2022, भुल्लनपुर गांव की बुजुर्ग माता का जज्बा, इस उम्र में सीखा पढ़ना लिखना अब करती हैं सारे काम

वाराणसी. international mother's day 2022: जिले के रोहनियां विधानसभा क्षेत्र के भूल्लनपुर गांव की 95 वर्षीया शांति देवी अब डाकघर से पैसा निकालते समय अंगूठा नहीं लगातीं बल्कि हस्ताक्षर करती हैं। दो वर्ष पूर्व उन्होंने ककहरा सीखा था। इसके बाद तो उन्हें पढ़ने की ऐसी लगन लगी कि रात-दिन एक कर उन्होंने शब्दों को लिखना और पढ़ना सीखा। कांपते हाथों से वह छोटे-छोटे वाक्य भी लिख लेती हैं।

70 वर्षीय तपेसरा का जज्ब, वो सब कुछ पढती हैं, हिसाब भी लगाती हैं

70 वर्ष की तपेसरा देवी को भी कभी अंगूठा छाप के रूप में जाना जाता था लेकिन अब वह भी जरूरी कागजातों पर अपना हस्ताक्षर कर लेती हैं। घर में आयी हुई खाद्य सामाग्रियो व अन्य सामानों के पैकेट पर छपे नाम को पढ़ लेती हैं। घरेलू खर्च भी वह डायरी में दर्ज कर लेती हैं।

भुल्लनपुर में ऐसी कई माताएं हैं जिन्होंने ढलती उम्र में सीखा पढ़ना- लिखना

रोहनियां के भुल्लनपुर गांव की रहने वाली सिर्फ शांति देवी और तपेसरा ही नहीं, इसी गांव की ललदेई (67), जड़ावती (66), सुगुना (64), लालती देवी (60) जैसे दर्जनों वह नाम हैं जो अब जरूरी कागजातों पर अपने अंगूठे का निशान नहीं लगाती बल्कि हस्ताक्षर करती हैं । हाल ही में अक्षर ज्ञान हसिल कर उन्होंने अपना हस्ताक्षर करना तो सीखा ही थोड़ा-बहुत लिखना पढ़ना भी शुरू कर दिया है। उम्र के आखिरी पड़ाव में भी इन बुजुर्ग महिलाओं में शिक्षा हासिल करने की हसरतें अपार हैं। घरेलू काम-काज से फुर्सत मिलते ही यह सभी लिखने-पढ़ने के अभ्यास में जुट जाती हैं। यह सब कुछ संभव हुआ है, इस गांव की रहने वाली बीना सिंह की मेहनत के चलते जो गांव में शिक्षा की अलख जगा रही हैं। बीना सिंह बताती हैं कि उनका मायका मिर्जापुर में है। बचपन से ही उनके मन में समाजसेवा की इच्छा थी। वह महिलाओं और बेटियों को पढ़ाना चाहती थी। ससुराल आने पर ससुर और पति से मिले प्रोत्साहन से उनके सपनों को पंख लग गये। घर की जिम्मेदारियों को संभालने के साथ ही उन्होंने पास-पड़ोस की महिलाओं को घर बुलाकर पढ़ाना शुरू किया। खासकर उनकों जो निरक्षर थीं। बीना सिंह बताती हैं कि दो वर्ष के भीतर अबतक सिर्फ भूल्लनपुर गांव समेत पड़ोसी गांवों की दो सौ से अधिक महिलाओं को वह साक्षर बना चुकी हैं।

तीन पीढ़ियां एक साथ लेती है शिक्षा

बीना सिंह शुरू में अपने घर के एक कमरे में ही इन महिलाओं को पढ़ाने का काम करती थीं । साक्षर हुई बुजुर्ग महिलाओं ने जब अपनी बहुओं और उनकी बेटियों को भी पढने के लिए प्रोत्साहित किया तब यह जगह छोटी पड़ने लगी। ऐसे में पड़ोसी लॉन संचालक ने मदद की और अपने लॉन का एक हिस्सा शिक्षा के इस अभियान के लिए उपलब्ध कराया। अब यहां तीन पीढ़ियां एक साथ पढाई करती हैं। जड़ावती देवी बताती हैं कि गांव के अधिकतर पुरुष मेहनत-मजदूरी करते हैं । महिलाओं की शिक्षा पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया था। पर अब ऐसा नहीं है। जड़ावती बताती हैं कि हर शाम वह खुद तो यहां लिखना-पढना सीखती ही हैं बहू अनिता को को भी साथ लाती हैं ताकि वह भी पढ़ना सीख ले। जड़ावती की ही तरह सुगुना भी अपनी बहू फूला देवी के साथ पढाई करती हैं। यहां शिक्षा ले रही लीलावती तो अपनी बहू के साथ उसकी बेटियों को भी अक्षर ज्ञान करा रही है। लीलावती बताती हैं कि वह चाहती हैं कि उसकी पोतिया यहां से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर अब विद्यालय जाना शुरू कर दें।

सभी का सपना - हर घर हो साक्षर अपना

भुल्लनपुर गांव में शिक्षा की जो अलख जगी है उससे यहां की सभी महिलाएं काफी उत्साहित हैं। सभी का बस यहीं सपना है कि गांव की हर महिला साक्षर हो जाए ताकि कोई उन्हें अंगूठा छाप न कह सके। इतना ही नहीं अपने बच्चों की शिक्षा पर भी सभी का पूरा ध्यान है। शिक्षित कर वे उन्हे अपने पर खड़ा कराना चाहती हैं।

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