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Happy Birthday Varanasi 24 मई, 1956 को दुनिया के सबसे प्राचीन शहर का नाम पड़ा था वाराणसी, पुण्यकाल में इस तरह तय हुआ था नाम

आनंद कानन, काशी, बनारस और अन्य नामों से पहचानी जाने वाली प्राचीन धर्म नगरी का आज ही के दिन यानी 24 मई 1956 को प्रशासनिक तौर पर वाराणसी नाम स्वीकार किया गया था
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वाराणसी

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Karishma Lalwani

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Updated: 24 May 2020, 11:44 AM IST

Happy Birthday Varanasi आज के दिन 24 मई 1956 को दुनिया के सबसे प्राचीन शहर का नाम पड़ा था वाराणसी

Happy Birthday Varanasi आज के दिन 24 मई 1956 को दुनिया के सबसे प्राचीन शहर का नाम पड़ा था वाराणसी

वाराणसी. आनंद कानन, काशी, बनारस और अन्य नामों से पहचानी जाने वाली प्राचीन धर्म नगरी का आज ही के दिन यानी 24 मई 1956 को प्रशासनिक तौर पर वाराणसी नाम स्वीकार (Varanasi Name Origin) किया गया था। उस दिन भारतीय पंचांग में दर्ज तिथि के अनुसार वैसाख पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा और चंद्रग्रहण का योग था। ऐसा कहा जाता है कि वाराणसी का नामकरण सबसे पुण्यकाल में स्वीकार किया गया था।

इसे जिले की पहचान से जुड़ी वरुणा व अस्सी नदियों के सम्मिलित रूप से लिया गया। आधिकारिक रूप से दस्तावेजों में दर्ज किया गया। हालांकि इस विशिष्ट नाम का मत्स्यपुराण में भी जिक्र है। एक मत के अनुसार अथर्ववेद में वरणावती नदी का जिक्र आया है जो आधुनिक काल में वरुणा का पर्याय माना जाता है। वहीं अस्सी नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा गया है। अग्निपुराण में असि नदी को नासी का भी नाम दिया गया है।

आधिकारिक रूप से इस नाम को सरकारी रूप से डॉ. संपूर्णानंद ने मान्यता दिलाई। वाराणसी की संस्तुति जब शासन स्तर पर हुई तब डा. संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। स्वयं डॉ. संपूर्णानंद की पृष्ठभूमि वाराणसी से थी और वो यहां काशी विद्यापीठ में अध्यापन से भी जुड़े रहे थे। यह जानकारी वाराणसी गजेटियर में बतौर दस्तावेज दर्ज है।

1965 में इलाहाबाद के सरकारी प्रेस से प्रकाशित गजेटियर में कुल 580 पन्ने हैं। सरकार द्वारा दस्तावेजों को डिजिटल करने के तहत सन 2015 में इसे ऑननलाइन किया गया। वाराणसी गजेटियर में लगभग 20 अलग-अलग विषय शामिल हैं। हालांकि बोलचाल की भाषा में काशी और बनारस आज भी कहा जाता रहा है।

घूमने नहीं बनारस को जीने आते हैं लोग

वाराणसी यानी बनारस’ एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही मंदिर, मस्जिद, गंगा, घाट, पान, साड़ी आदि नामों का जेहन में आना आम बात है। अल्हड़ बनारस अपनी बेफिक्री और फक्कड़पन के लिए दुनियाभर में मशहूर है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि यहां मरने पर मोक्ष मिलता है। पर ज्यादा लोगों का यकीन है कि यहां आने के बाद फिर कहीं और जाने की इच्छा की नहीं रह जाती। काशी से जुड़े लोग कहते हैं की लोग बनारस घूमते नहीं जीते हैं।

लाखों दीवाने हैं इस शहर के

वाराणसी के दीवानों की फेहरिस्त पूरी दुनिया मदन है। यहां आने के बाद पर्यटक जैसे जस शहर को दिल देकर चला जाता है। जाए के बाद सालों तक लोग इस शहर को अपनी यादों में बसा जाते हैं। बनारस देखना है तो घाटों पर समय बितायें और पक्के महाल जाएं। श्रीकाशी विश्वनाथ के दर पर जाकर शीश नवायें। सड़क किनारे चाय की बैठकी में शामिल हों। फूलों का व्यापार हो या साड़ियों और मोतियों का, बनारसी कला की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। केवल भारत नहीं, दुनिया भर में मशहूर है इस शहर का खानपान। कोई गली कचौड़ी जलेबी के लिए प्रसिद्ध है तो कोई मलाईयों के लिए। कहीं रस मलाई तो कहीं चटपटी चाट। व्यंजनों के मामले में हर गली-मोहल्ले खास हैं। बात इतर है, लॉकडाउन की वजह से मानो बनारस थम सा गया है।

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