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काशी में देव दीपावली, गंगातट पर असंख्य दीपों संग उजाले का जश्न

हजारों लोगों ने एक साथ जलाए असंख्य दिये। गूंजता रहा हर-हर महादेव का उद्घोष।

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Mohd Rafatuddin Faridi

Nov 15, 2016

Dev Dipawali varanasi

Dev Dipawali varanasi

एमआर फरीदी

वाराणसी. घाट की सीढ़ियों पर टिमटिमाते दिये और आसमान में चमकते तारों के साथ चांदनी बिखेरता पूर्णिमा का चांद। मानो दोनों में अपनी दिलफरेब चमक बिखेरने का कम्पटीशन हो रहा हो। शायद इन दोनों की चमक को देखकर देवता भी असमंजस में पड़े हों, अपसराएं इसी धोखे में स्वर्ग से उतर आई हों। देवताओं को भी पृथ्वीलोक में देवलोक का भ्रम हो गया हो। ये खयाल दिल में महज यूं ही नहीं आ गए, काशी में देव दीपावली पर पूरा गंगातट जब करोड़ों दीपों से जगमगा उठा और गंगा के पानी में पूर्णिमा के चांद व आकाश के तारों का प्रतिबिम्ब उतर आया तो नजारे दिल में उतर गए। ऐसा लगा जैसे महादेव खुद पृथ्वीलोक पर उतरकर आरती कर रहे हों। हजारों दीपक अर्धचन्द्राकार आकृति में ऐसे लग रहे थे जैसे काशी के गले में दीपों की माला हो।



अचानक गूंजता हर-हर महादेव का उद्घोष रोम-रोम को झंकृत कर देता और फिर यही महादेव की जयकार सांसों की माला के साथ मिल जाती। सैलानी इस पूरे नजारे को अचरज भरी निगाहों से देखते और कैमरे के फ्रेम में अटाने की कोशिश करते पर आसमान के तारे की तरह गंगा का तट जैसे उस समय और ज्यादा फैला हुआ लगता। काशीवासियों के लिये यह नया नहीं था पर जिन्होंने पहली बार देखा, उनके लिये यह स्वर्ग के नजारे कम भी नहीं था। घाटों पर महादेव का उद्घोष हो रहा था तो नीचीबाग और गुरुबाग के गुरुद्वारे में सत्यनाम वाहे गुरू गुंजायमान था। वहां गुरूनानक देव जी का गुरू पर्व मनाया जा रहा था। गुरू पर्व और देव दीपावली के इसी संयोग और नजारे ने नजीर बनारसी को लिखने के लिये मजबूर कर दिया होगा कि नहाने उतरा है पूनम का चांद पानी में, न स्वर्ग सांस ले क्यूं रात की जवानी में, इजाफा क्यूं न हो गंगा तेरी रवानी में, गुरू का जश्न है शंकर की राजधानी में।



बुजुर्ग कहते हैं कि काशी का रंग भी यही है और ढंग भी यही। देव दीपावली की अद्भुत छटा देखने के लिये ऐसा नहीं कि सिर्फ हिन्दू ही पहुंचे। टोपी लगाए मुसलमान भी थे, क्रिश्चियन भी और बाकी दूसरे मजहब के लोग भी। ऐसे नजारे शायद धर्मों के बंधन में नहीं बांधे जा सकते। ये संदेश सिर्फ काशी से ही दिया जा सकता है। शायद ऐसे ही नजारों और संदेशों से अभीभूत होकर पीएम नरेन्द्र मोदी ने कहा हो कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है। नामुमकिन नहीं, क्योंकि देव प्रयाग से लेकर गंगा सागर तक बहता गंगा का पानी लोगों को इसी तरह आकर्षित करता है और फिर यह तो काशी है।


सोमवार को देव दीपावली के मौके पर हजारों लोगों ने एक साथ असंख्य दीप जलाए। करीब दो घंटे तक लगातार दीपक में तेल डालने का क्रम चला ताकि वह अपनी रोशनी बिखेरते रहें। पानी में सैकड़ों नावों और बजड़ों पर बैठे लोग इसका नजारा ले रहे थे। पैदल लोगों की भीड़ अस्सी घाट से लेकर खिड़किया घाट तक थी। कहीं-कहीं तो भीड़ के चलते आगे जाना मुश्किल था। मॉरिशस के प्रधानमन्त्री अनिरुद्ध जगन्नाथ खुद देव दीपावली देखने पहुंचे थे। केन्द्र और राज्य सरकार के मन्त्री व अधिकारी भी वहां थे।



ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में त्रिपुरासुर नाम का एक राक्षस हुआ था। तीनों लोकों में उसका बड़ा आतंक था। उससे तीनों लोकों को निजात दिलाने के लिये भगवान शंकर ने उसका वध कर दिया। उसी दिन देवताओं ने स्वर्ग में दीपावली मनाई। एक कथा ये भी प्रचलित है कि काशी के राजा देवदास एक बार देवताओं से नाराज हो गए और उनके काशी में आने पर ही रोक लगा दी। बाद में ब्रह्मा जी के कहने पर यह रोक हटाई। कहा जाता है कि इस खुशी में देवताओं ने कार्तिक महीने में काशी के पंचगंगा घाट पर स्नान किया और वहां दीप जलाए। इसी के बाद से गंगा घाटों की सीढ़ियों पर दिये जलाकर देव दीपावली मनाने की परम्परा शुरू हो गई।



कहानियां और मान्यताएं चाहे जो भी हों, पर वर्तमान में इस पर्व का वैभव और बढ़ता जा रहा है, जिसका फायदा यहां के करोबारियों को भी होता है। अनुमान के मुताबिक इस दौरान करोड़ों की खरीदारी होती है। बाहर से आए पर्यटक बाजारों का रुख करते हैं। होटल और लॉज एडवांस बुक हो जाते हैं। इसके अलावा गंगा में बड़े बजड़े और नावं ही नहीं छोटी नौकाएं तक उंचे दामों पर बुक रहती हैं। हो भी क्यों न भारत के पर्वों का अर्थशास्त्र भी महत्वपूर्ण है।

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