अचानक गूंजता हर-हर महादेव का उद्घोष रोम-रोम को झंकृत कर देता और फिर यही महादेव की जयकार सांसों की माला के साथ मिल जाती। सैलानी इस पूरे नजारे को अचरज भरी निगाहों से देखते और कैमरे के फ्रेम में अटाने की कोशिश करते पर आसमान के तारे की तरह गंगा का तट जैसे उस समय और ज्यादा फैला हुआ लगता। काशीवासियों के लिये यह नया नहीं था पर जिन्होंने पहली बार देखा, उनके लिये यह स्वर्ग के नजारे कम भी नहीं था। घाटों पर महादेव का उद्घोष हो रहा था तो नीचीबाग और गुरुबाग के गुरुद्वारे में सत्यनाम वाहे गुरू गुंजायमान था। वहां गुरूनानक देव जी का गुरू पर्व मनाया जा रहा था। गुरू पर्व और देव दीपावली के इसी संयोग और नजारे ने नजीर बनारसी को लिखने के लिये मजबूर कर दिया होगा कि नहाने उतरा है पूनम का चांद पानी में, न स्वर्ग सांस ले क्यूं रात की जवानी में, इजाफा क्यूं न हो गंगा तेरी रवानी में, गुरू का जश्न है शंकर की राजधानी में।