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UP Election- मायावती सत्ता में आईं तो साकार होगा पूर्वांचल राज्य का सपना

लग सकता है भाजपा को झटका, पूर्वांचल राज्य समर्थक छोटे दल छोड़ सकते हैं भाजपा का दामन, 2008 से माया कर रही हैं पूर्वांचल राज्य की मांग, 2007-2012 के शासन काल में केंद्र को भेजा था प्रस्ताव, फिर उठाया है मुद्दा, अब कांग्रेस भी माया को कर रही फालो, शीला-राजबब्बर, प्रमोद तिवारी आए हैं समर्थन में, जानें क्या है पूर्वाचंल राज्य की सियासत की हकीकत...

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Ajay Chaturvedi

Sep 05, 2016

Mayawati

Mayawati

डॉ. अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी.
यूपी विधानसभा चुनाव आते ही पूर्वांचल राज्य की सियासत तेज हो गई है। इस बार इसे हवा दी है बसपा सुप्रीमों मायावती ने। मायावती जो 2008 से उत्तर प्रदेश के बंटवारे की पक्षधर हैं। वह कहती हैं कि 2007 से 2012 के शासन के दौरान केंद्र सरकार को पूर्वांचल राज्य के गठन का प्रस्ताव भेजा था लेकिन लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। वह प्रदेश में सत्तारूढ सपा सरकार और केन्द्र में भाजपा सरकार को भी निशाने पर ले रही हैं। कहती हैं दोनों ने पूर्वांचल राज्य के गठन के लिए कुछ नहीं किया। बता दें कि कि लोकमंच के संस्थापक रहे सपा सुप्रीमों मुलायम सिहं यादव के मित्र अमर सिंह, लोकतांत्रिक मोर्चा के बाद भारतीय समाज पार्टी बनाने वाले ओम प्रकाश राजभर का भी मुख्य एजेंडा रहा है पूर्वांचल राज्य। अब कांग्रेस भी पूर्वांचल की बात करने लगी है। सीएम कैंडिडेट शीला दीक्षित हों या प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर अथवा राज्य सभा सदस्य प्रमोद तिवारी सभी एक सुर से पृथक पूर्वांचल राज्य का राग अलापने लगे हैं। बनारस से आजमगढ़ जाते वक्त चोलापुर के शहीद स्थल पर मीडिया से मुखातिब शीला दीक्षित ने तो इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करने का भी वादा कर दिया है। कौमी एकता दल भी पूर्वांचल राज्य का समर्थक है। तो क्या यह मुद्दा इस विधानसभा चुनाव में जोर पकड़ेगा। ऐसा होता है तो केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए संकट पैदा होगा। भाजपा ने जिन छोटी-छोटी जाति आधारित पार्टियों से गठबंधन किया है उसमें भासपा जैसी कई पार्टियां पृथक पूर्वांचल राज्य समर्थक हैं। ऐसे में एक ही विकल्प है कि भाजपा भी उत्तर प्रदेश के बंटवारे के समर्थन में आए अन्यथा गठबंधन टूटने का अंदेशा खड़ा हो सकता है।



क्या है तर्क पृथक पूर्वांचल राज्य मांगने वालों का
बसपा सुप्रीमों मायावती ही नहीं भासपा नेता ओम प्रकाश सिंह हों या लोकमंच के बाद अब सपा में शामिल मुलायम सिंह के करीबी अमर सिंह अथवा कौमी एकता दल के नेता हों सभी का कहना है कि आजादी के बाद देश के जिन प्रदेशो का बंटवारा हुआ वो आज समृद्ध और खुशहाल है। महाराष्ट्र प्रदेश के बंटवारे का हवाला देकर कहते हैं कि महाराष्ट्र और गुजरात बनते ही वहां विकास की इबारत लिखी जा चुकी है। इसी तरह आसाम प्रदेश को सात हिस्सो में बांटा गया। बंटवारे के बाद आसाम, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, अरूणाचंल प्रदेश भी विकास के पथ पर है। यहां तक कि यूपी से अलग हुआ उत्तराखंड भी विकास के पथ पर अग्रसर है। बिहार से अलग झारखंड में भी तेजी से विकास हो रहा है। अगर पूर्वांचल प्रदेश बना तो यहां भी विकास की नयी इबारत लिखी जाएगी।





















पूर्वांचल राज्य के पक्ष में क्या तर्क है मायावती का

प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का कहना है कि पिछले शासनकाल में ही पूर्वांचल राज्य का मुद्दा उठाया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग की थी। तब केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार पृथक तेलंगाना राज्य का वादा कर संकट में फंसी थी। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पूर्व प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन कर अलग से पूर्वांचल राज्य गठित करने के लिए सहमति प्रदान करने का अनुरोध किया था। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि केंद्र सरकार से सहमति प्राप्त होने पर राज्य सरकार उत्तर प्रदेश की विधानसभा से अलग पूर्वांचल राज्य के गठन का प्रस्ताव पारित कराकर केंद्र सरकार को भेज देगी। तब मायावती ने अपने पत्र में 15 मार्च, 2008 के उस पत्र का हवाला भी दिया था जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश को पुनर्गठित कर अलग पूर्वाचल राज्य बनाने की बात कही थी और केंद्र सरकार से इस दिशा में कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। बता दें कि मायावती ने कहा था कि राज्य में से अलग हरित प्रदेश और बुंदेलखंड राज्य बनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि बहुजन समाज पार्टी छोटे राज्यों के गठन का समर्थन करती है, क्योंकि छोटे राज्यों में प्रशासन बेहतर तरीके से चलाया जा सकता है। उनका कहना था कि अगर केंद्र सरकार हरित प्रदेश पर प्रस्ताव लाती है तो बसपा इसे अपना समर्थन देगी।


कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी के तब व अब के बयान
तब उत्तर प्रदेश कांग्रेस के विधानमंडल दल के नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि मायावती पूर्वांचल बनाने को लेकर गंभीर नहीं हैं और वो समस्याओं से लोगों का ध्यान बंटाना चाहती हैं। अब रविवार को वाराणसी में मीडिया से मुखातिब राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ने कहा कि विधानपरिषद में सबसे पहले मैने ही पूर्वांचल व बुंदेलखंड राज्य का प्रस्ताव रखा था।


प्रस्तावित पूर्वांचल व बुंदेलखंड राज्य की सीमा

प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य में कुल 28 जिले, 32 संसदीय क्षेत्र और 165 विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया है। यहां तक कि पश्चिमी बिहार के जिलों को भी मिलाने की बात चलती रहती है। प्रस्तावित जिलों में, जौनपुर, गाजीपुर, भदोही, चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, कौशांबी, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, अम्बेडकर नगर, फैजाबाद, गोंडा, बलरामपुर, बहराइच, खीर, बस्ती, महराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़, बलिया, मऊ, श्रावस्ती, संत रविदास नगर, सिद्धार्थनगर सहित बिहार के छपरा, सिवान, गोपालगंज, मोतीहारी, बक्सर, आरा,रोहतास तक। उधर बुंदेलखंड में तीन मंडल 11 जिलों को शामिल किया गया है जिसमें झांसी, महोबा, बांदा, हमीरपुर, ललितपुर और जालौन शामिल हैं।


पूर्वांचल दे चुका है एक राष्ट्रपति और चार प्रधानमंत्रू
प्रस्तावित पूर्वांचल राज्य से इस देश को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्ट राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू के अलावा लालबाहुदर शास्त्री, चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह दिया है। जातीय समीकरण पर नजर डालें तो दलित 20-24 प्रतिशत, मुस्लिम 8-27 प्रतिशत, ब्राह्मण 19-23 प्रतिशत के अलावा यादव, राजभर, कुर्मी हैं।


1964 में गाजीपुर के सांसद गहमरी ने उठाया था सवाल
इतिहास गवाह है कि 1964 में गाजीपुर के पूर्व सांसद विश्वनाथ गहमरी ने लोकसभा में हृदयविदारक तस्वीर पेश की तब प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखें भी छलक आई थीं। उसके बाद ही पंडित नेहरू ने पटेल सीमित बनाई लेकिन आज तक उस समिति का पता ही नहीं चला।


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