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अब बनारसी साड़ी के ताने-बाने को जोड़ने में जुटीं मुस्लिम महिलाएं, दुनिया में परचम लहराने को तैयार

16 महिलाओं ने शुरू किया काम अब 100 महिलाएं जुड़ चुकी हैं इस अभियान से। सुदूर गांवों में भी सुनाई देने लगी करघे की खटर-पटर।

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बनारसी साड़ी तैयार करती मुस्लिम महिलाएं

बनारसी साड़ी तैयार करती मुस्लिम महिलाएं

वाराणसी. वर्षों से भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुकी बवनारसी साड़ी का फिर से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में परचम लहराने की है तैयारी। अबकी यह बीड़ा उठाया है काशी की मुस्लिम महिलाओं ने। जो कारीगरी दम तोड़ चुकी थी, बुनकरों ने पुश्तैनी काम छोड़ कर नौकरी का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया था। अब उन्हीं के घरों की महिलाएं आगे आई हैं। उन्होंनें शुरू किया है उस टूटे हुए ताने-बाने को फिर से जोड़ने का काम। अब वे पारंपरिक बनारसी साड़ी के साथ साथ आधुनिक फैशन के मुताबिक भी परिधान बनाने लगी हैं ताकि बनारस की लुप्त होती इस परंपरा को पुनर्जीवित कर सकें और बनारसी साड़ी के परचम को फिर से अंतर्राष्ट्रीय बाजार दे सकें।

वर्षों से मंदी झेल रहे बनारसी साड़ी के कारीगरों का दम धीरे-धीरे टूटता गया। करघों की खटर-पटर थमने लगी। विश्वप्रसिद्ध बनारसी साड़ी का कारोबार मुनाफे वाला नहीं रहा। कारीगर से लेकर गद्दीदार तक इससे तौबा करने लगे। इसी बीच उन पर पड़ी नोटबंदी और जीएसटी की मार। पहली बार बनारसी साड़ी पर किसी तरह का कर लगा। ऐसे में शहर से लेकर गांव तक में बनारस साड़ी कारोबार से जुड़े लोगों ने इससे तौबा कर लिया। वे बनारस और आसपास के शहरों में ही नहीं सुदूर मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जाने लगे नौकरी की तलाश में। एक तरह से कहें तो भदोही के कालीन उद्योग की ही तरह बनारसी साड़ी का रोजगार भी प्रायः मृतप्राय हो चला। ऐसे में बनारसी साड़ी बनाने वाले कारीगरों की कमी ने हथकरघा पर तैयार होने वाली बनारसी साड़ियों के उत्पादन को काफी कम कर दिया। उसमें तड़का दिया तेजी से बदल रहे फैशन ने।

हालात इस कदर बदले कि बनारस की शान कही जाने वाली इन साड़ियों और इन्हें तैयार करने के लिए घनी बस्तियों के साथ दूरदराज के गांवों में चलने वाले करघों की खटर पटर बंद हो गई। ताने बाने के बल पर बुनकरों की जिंदगी का ताना बाना भी टूटने लगा। लेकिन एक बार फिर से बनारसी साड़ी उद्योग ने जीआई मार्क मिलने के बाद तेजी पकड़ी।इस काम को भी रफ्तार देने की जिम्मेदारी पुरुषों ने नहीं बल्कि महिलाओं ने भी उठाई है। जीआई विशेषज्ञ डॉ रजनीकांत का कहना है कि सितंबर 2009 में बनारसी साड़ी को जीआई का प्रमाणपत्र मिलने के बाद हथकरघा की बनारसी साड़ी की मांग बढ़ी। उस दौर में इस काम से दूर हो चुके बुनकरों के कारण समय से उत्पाद तैयार नहीं हो पा रहा था। इस कमी को दूर करने, महिला बुनकरों को प्रतिस्थापित करने, प्रशिक्षित कर उन्हें बाजार से जोड़ने के लिए ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन ने वाराणसी के सजोई गांव से मुस्लिम परिवार की 16 युवतियों को तैयार करने एवं रोजगार दिलाने की योजना पर काम शुरू किया।

काशी विद्यापीठ में एमए कर रही फिज़ा बानो का कहना है की अगर पढाई के साथ अपने पुश्‍तैनी काम को करते हुए रोज 300-400 रुपये साड़ी बुनने पर मिलता है तो हमारे लिए खराब क्या है। ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़े जलालुद्दीन अंसारी का कहना है कि बुनकरों की घटती संख्या की वजह से बनारसी साड़ी उद्योग को बड़ा नुकसान हो रहा था लेकिन जब इन 16 युवतियों ने बुनकरी की शुरुआत की तो इन्हें देखकर और युवतियां और महिलाएं भी इस पेशे से जुड़ गई। अब तो अकेले बनारस में 100 से ज्यादा युवतियां और महिलाएं साड़ी बुनाई का काम कर रही हैं। इनकी तैयार की गई साड़ियों की डिमांड विदेशों में है। कई बड़े होटल ग्रुप और बड़े शोरूम में भी पूछ है इन मुस्लिम महिला कारीगरों के हाथ की बने बनारसी वस्त्रों की। इसका सीधा फायदा इन्हें मिलता है और इस काम के बल पर यह अपने और अपने परिवार की जिंदगी भी सुधार रही हैं।

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