शहर के बुद्धिजीवी बताते हैं कि इतिहास गवाह है कि 1958 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने शिलान्यास किया था। लेकिन हिंदी साहित्य की समृद्धि की ठेकेदार संस्था की बदौलत वह कूड़े की ढेर में चला गया। फिर 2005 में 31 जुलाई को एक और अवसर आया। तब भी समाजवादी पार्टी की ही सरकरा थी राज्य में और केंद्र में एनडीए की सरकार। तत्कालीन मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव। एक पहल हुई। काशी के बुद्धिजीवियों को लगा कि उनका अथक प्रयास आकार लेगा। प्रेमचंद शोध एवं अध्ययन केंद्र का शिलान्यास हुआ। मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव, केंद्रीय संस्कृति मंत्री जयपाल रेड्डी, सांसद सरला माहेश्वरी, साहित्यकार नामवर सिंह, शिवकुमार मिश्र, चन्द्रबली सिंह, कृष्ण कुमार राय, आदि तमाम साहित्यकार शाक्षी बने। तत्कालीन जिलाधिकारी नितिन रमेश गोकर्ण और जिला संस्कृति अधिकारी डॉ.लवकुश द्वीवेदी ने भी योजना को मूर्त रूप देने की कवायद शुरू की। लेकिन वक्त गुजरता गया, बात जहां से शुरू हुई थी वहीं अटकी पड़ी है। 2005 से 2016 आ गया पर शोध एवं अध्ययन केंद्र आकार न ले सका।