वाराणसी. जगद्गुरु रामभद्राचार्य का नाम आज देश ही नहीं पूरी दुनियां में गर्व के साथ लिया जाता है। सनातन धर्म को दुनियांभर के कोने-कोने में पहुंचाने वाले जगद्गुरु रामभद्राचार्य एक ऐसे संन्यासी हैं जो दिव्यांगता को हराकर जगत्गुरू बने। बचपन में ही आंखों की रोशनी चली जाने के बावजूद भी जगद्गुरु रामभद्राचार्य को आज 22 भाषाएं आती हैं और ये 80 ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शांडिखुर्द ग्राम में 14 जनवरी 1950 को रामभद्राचार्य का जन्म हुआ। इनके पिता का नाम पंण्डित राजदेव मिश्र और माता का नाम शची देवी था। इनके बारे में कहा जाता है कि ये भारत के एक हिंदू धार्मिकनेता, शिक्षाविद्, संस्कृतविद्वान, बहुभाषाविद, कवि, लेखक, टीकाकार, दार्शनिक, संगीतकार, गायक, नाटककार और कथा-कलाकार हैं। इनके बचपन का नाम गिरिधर मिश्रा है।