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हिंदू धर्म को  दुनियां भर में पहुंचाने वाले इस संत की दो माह में चली गई थी आंखों की रोशनी, अब जानते हैं 22 भाषाएं

तीन वर्ष की उम्र में ही कर दी थी कविता की रचना 

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Ashish Kumar Shukla

Jun 17, 2017

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वाराणसी. जगद्गुरु रामभद्राचार्य का नाम आज देश ही नहीं पूरी दुनियां में गर्व के साथ लिया जाता है। सनातन धर्म को दुनियांभर के कोने-कोने में पहुंचाने वाले जगद्गुरु रामभद्राचार्य एक ऐसे संन्यासी हैं जो दिव्यांगता को हराकर जगत्गुरू बने। बचपन में ही आंखों की रोशनी चली जाने के बावजूद भी जगद्गुरु रामभद्राचार्य को आज 22 भाषाएं आती हैं और ये 80 ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शांडिखुर्द ग्राम में 14 जनवरी 1950 को रामभद्राचार्य का जन्म हुआ। इनके पिता का नाम पंण्डित राजदेव मिश्र और माता का नाम शची देवी था। इनके बारे में कहा जाता है कि ये भारत के एक हिंदू धार्मिकनेता, शिक्षाविद्, संस्कृतविद्वान, बहुभाषाविद, कवि, लेखक, टीकाकार, दार्शनिक, संगीतकार, गायक, नाटककार और कथा-कलाकार हैं। इनके बचपन का नाम गिरिधर मिश्रा है।


Ramabhadracharya with ravishakar


दो माह की उम्र में ही चली गई आंखों की रोशनी
जौनपुर जिले के शांडिखुर्द ग्राम में जन्मे जगद्गुरु रामभद्राचार्य की की आँखों में रोहे हो गए। गाँव में आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध नहीं थी। बालक को एक वृद्ध महिला चिकित्सक के पास ले जाया गया जो रोहे की चिकित्सा के लिए जानी जाती थी। चिकित्सक ने गिरिधर की आँखों में रोहे के दानों को फोड़ने के लिए गरम द्रव्य डाला, परन्तु रक्तस्राव के कारण गिरिधर के दोनों नेत्रों की ज्योति चली गयी। जिस समय इनके आंखों की रोशनी गई तो गिरिधर सिर्फ दो माह के थे। परिवार के लोगों ने बहुत प्रयास किया कि अपने बेटे यानि गिरधर की आंखों की रोशनी को कैसे भी कर के वापस लाया जा सके। पर दुर्भाग्य से हरक कोशिश नाकाम रही।



Ramabhadracharya


प्रतिभावन गिरिधर ने तीन वर्ष में ही की ये रचना

बचपन से ही बालक गिरिधर यानि रामभद्राचार्य बहुत ही ओजस्वी थे परिवार धार्मिक होने के कारण घर में पूजा पाठ का माहौल रहता था। ऐसे मेें बालक गिरिधर का भी धर्म के प्रति रूझान रहा तीन साल की उम्र में ही ये इस बालक ने इस कविता की रचना कर दी। स कविता में यशोदा माता एक गोपी को श्रीकृष्ण से लड़ने के लिए उलाहना दे रही हैं।


मेरे गिरिधारी जी से काहे लरी ॥
तुम तरुणी मेरो गिरिधर बालक काहे भुजा पकरी ॥
सुसुकि सुसुकि मेरो गिरिधर रोवत तू मुसुकात खरी ॥
तू अहिरिन अतिसय झगराऊ बरबस आय खरी ॥
गिरिधर कर गहि कहत जसोदा आँचर ओट करी ॥




Ramabhadracharya with president































जगद्गुरु रामभद्राचार्य की शिक्षा

जगद्गुरु रामभद्राचार्य की शिक्षा जौनपुर जनपद के सुजानगंज स्थित गौरीशंकर विद्यालय में जहाँ उन्होंने संस्कृत व्याकरण के साथ-साथ हिन्दी, आङ्ग्लभाषा, गणित, भूगोल और इतिहास का अध्ययन किया।
१९७१ में गिरिधर मिश्र वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत व्याकरण में शास्त्री (स्नातक उपाधि) के अध्ययन के लिए प्रविष्ट दाखिला लिये। १९७४ में उन्होंने सर्वाधिक अंक हासिल करते हुए स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद गिरिधर मिश्र ने परास्नातक के अध्ययन के लिए इसी विश्वविद्यालय दाखिला लिया। परास्नातक अध्ययन के दौरान १९७४ में अखिल भारतीय संस्कृत अधिवेशन में भाग लेने गिरिधर मिश्र नयी दिल्ली गये। अधिवेशन में व्याकरण, सांख्य, न्याय, वेदान्त और अन्त्याक्षरी में उन्होंने पाँच स्वर्ण पदक जीते। भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने उन्हें पाँचों स्वर्णपदकों के साथ उत्तर प्रदेश के लिए चलवैजयन्ती पुरस्कार प्रदान किया था। संस्कृत विश्वविद्यालय से ही रामभद्राचार्य ने पीएचडी की भी उपाधि ली। वे न तो पढ़ सकते हैं और न लिख सकते हैं और न ही ब्रेल लिपि का प्रयोग करते हैं. वे केवल सुनकर सीखते हैं और बोलकर अपनी रचनाएं लिखवाते हैं।

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2015 में मिला पद्मविभूषण सम्मान

रामभद्राचार्य चित्रकूट में स्थित संत तुलसीदास के नाम पर स्थापित तुलसी पीठ नामक धार्मिक और सामाजिक सेवा स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के संस्थापक हैं और आजीवन कुलाधिपति हैं। जगद्गुरु रामभद्राचार्य आज 22 भाषाएं जैसे संस्कृत, हिन्दी, अवधी, मैथिली को जानते हैं और 80 से अधिक पुस्तकों और ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। जिनमें चार महाकाव्य (दो संस्कृत और दो हिन्दी में ) हैं। उन्हें तुलसीदास पर भारत के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों में गिना जाता है। साल 2015 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया





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