परीक्षाओं की घटती साख, देश की शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न

प्रश्न पत्रों के लीक मामले में प्रथम द्रष्ट्या प्रश्न पत्र निर्माता, प्रश्न पत्र माडरेटर, परीक्षा नियंत्रक, मुद्रक, प्रश्न पत्र संरक्षक जिम्मेदार।

प्रो. ओंकार सिंह

यूं तो विभिन्न नौकरी से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता पर प्रश्न चिह्न लगना हमारे देश में अक्सर सुनने में आता रहा है। लेकिन हाल के दिनों में देश की प्रतिष्ठित केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षाओं की दसवीं और बारहवीं का प्रश्न पत्र लीक मामलों ने शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ रूपी माध्यमिक शिक्षा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इस प्रश्न पत्र लीक मामले के प्रति संवेदनशीलता इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसने दसवीं और बारहवीं स्तर के बच्चों की मासूमियत पपर भी प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं। अभी तक की आम धारणा यही कहती है कि बारहवीं कक्षा तक के स्कूली बच्चे परीक्षाओं में बेहतर करनेर के लिए परीक्षा में नकल करते हैं जिसमें वे और उनके समकक्षी छात्र-छात्राएं ही लिप्त होते हैं। कोई संगठित तंत्र नहीं। माध्यमिक स्तर की परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों के लीक होने का मामला परोक्ष रूप से किसी छात्र-छात्रा की भूमिका को नकारते हुए परीक्षा तंत्र के सफल संचालन के लिए जिम्मेदारों की सत्यनिषि्ठा पर सवाल उठाता है। प्रश्न पत्रों के लीक मामले में प्रथम द्रष्ट्या प्रश्न पत्र निर्माता, प्रश्न पत्र माडरेटर, परीक्षा नियंत्रक, मुद्रक, प्रश्न पत्र संरक्षण के लिए जिम्मेदारों व परीक्षा केंद्रों तथा आयोजकगणों में से किसी एक अथवा कई की संदिग्ध भूमिका होने की आशंका प्रतीत होती है जिससे किसी भी स्तर पर छात्र-छात्राओं की सीधी सहभागिता नहीं है। यह जरूर है कि ऐसा करने वालों ने कतिपय छात्र-छात्राओं को इस प्रकार का प्रलोभन देकर अनैतिक मार्ग दिखाने का घृणित कार्य किया है।

 

यहां यह विचारणीय है कि यह मासूम छात्र-छात्राएं जो कि बचपन से अपनी क्षमताओं के अनुरूप ही परीक्षा परिणाम स्वीकार करते रहते हैं, अचानक किन कारणों से इन बोर्ड परीक्षाओं से पूर्व प्रश्न पत्र लीक जैसे अनैतिक मार्गों से अपने छद्म परीक्षा परिणाम की ओर से उन्मुख हो जाते हैं। इसी कड़ी में यह भी गौर तलब है कि हाल में परीक्षाओं में शुचिता बरतने के उत्तर प्रदेश परीक्षा बोर्ड के सघन प्रायासों के चलते बड़ी तादाद में छात्र-छात्राओँ ने परीक्षा केंद्र में नकल की संभावना न होने के चलते परीक्षाओं से ही स्वयं को विरत रखा और बड़ी संख्या में अनुपस्थिति के आंकड़े प्रकाश में आए। इन दोनों दृष्टांतों में एक में प्रश्न पत्र लीक के माध्यम से कतिपय छात्र-छात्राओं के परीक्षा परिणामों को बेहतर कराने का प्रयास और दूसरे में छात्र-छात्राओं द्वारा परीक्षा केंद्रों पर नकल के माध्यम से परिणामो को बेहतर करने का कुत्सित प्रायस की समानता तो परिलक्षित होती है। लेकिन प्रश्न पत्र लीक की समस्या अत्यंत गंभीर है क्योंकि यह हमारी शिक्षण प्रणाली के महत्वपूर्ण हिस्से परीक्षा तंत्र के विभिन्न अंगों की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न लगाता है। विभिन्न स्तरीय शैक्षणिक परीक्षाओं के गुणवत्तापरक न होने का ही नतीजा है कि देश में औपचारिक शिक्षा की परीक्षाओं के उत्तीर्ण करने के बाद किसी भी स्तर पर चाहे वह सेवायोजन हो अथवा उच्च शिक्षा, प्रत्येक स्तर पर पुनः परीक्षाएं लेकर आंकलन किया जाता है जो कि औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत परीक्षोपरांत निर्गत प्रमाणपत्रों की प्रासंगिकता पर ही संशय पैदा करता है।

माध्यमिक शिक्षा के अंतर्गत दसवीं और बारहवीं स्तर के छात्र-छात्राओं का परीक्षा की शुचिता भंग करने वाले अनैतिक रास्तों की ओर रुझान उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के साथ वर्तमान मानव सभ्यता व तकनीकी विकास की संधारणीयता के दृष्टिगत चिंतनीय है। गौर करना चाहिए कि जब देश की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में किसी भी प्रकार की गुणवत्ता की कमी आएगी तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों में स्वतः ही समुचित क्षमताओं का समावेशित होना संभव न हो सकेगा। शिक्षा के प्रारंभिक चरणों में सुधार किए बिना मात्र उच्च शिक्षा के स्तर से वांछित गुणवत्ता के स्नातक व परास्नातक की उम्मीद रखना बेमानी होगी।

प्रो ओंकार सिंह

हालांकि समय के साथ जांच समितियों और जांच आयोगों के माध्यम से ऐसी घिनौनी घटना को अंजाम देने वालों का पता तो लग जाएगा और ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की कार्ययोजनाएं भी बनाई जाएंगी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है कि इन घटनाओं के कारणों और प्रेरकों को चिह्नित कर जड़ से समाप्त किए जाने के प्रयास किए जाएं। आज देश की शिक्षा प्रणाली में माध्यमिक शिक्षा के स्तर तक की व्यवस्था का यदि गहराई से आंकलन किया जाए तो यह स्थापित होगा कि कहीं न कहीं स्कूलों में शिक्षण के स्तर और मूल्यांकन के स्तर में काफी अंतर है और कहीं न कहीं यह छात्र-छात्राओं को स्कूलों से समुचित ज्ञानार्जन न होने के कारण अनैतिक रास्तों को चुनने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि बारहवीं के बाद उच्च शिक्षा में प्रवेश पाने के लिए कोचिंग का सहारा लेना मेधावी छात्रों के लिए भी आवश्यक सा हो गया है और कोचिंग का जाल पूरे देश में समग्रता से फैल चुका है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन कोचिंग संस्थानों ने अपने ववयावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मान्यता प्राप्त स्कूलों को मात्र परीक्षा दिलाने के केंद्र की भूमिका में सीमित कर दिया है और समाज के बड़ी आबादी ने तात्कालिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा की इस परिमार्जित व्यवस्था को स्वीकार भी कर लिया है। समाज के आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग के लिए ऐसी व्यवस्था भले ही सहज लगती हो लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के समाज के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के लिए स्कूलों के साथ माध्यमिक शिक्षा स्तर पर कोचिंग को सतत् रूप से लेना दुष्कर है। उच्च शिक्षा के लिए माध्यमिक शिक्षा तंत्र द्वारा तैयार की जा रही पौध में किसी भी प्रकार की कमी यह इंगित करती है कि कहीं न कहीं कोई न कोई कारण तो जरूर है क्योंकि कतिपय विषयों पर आधारित प्रवेश परीक्षा में निश्चित मानक से आगे अंक पाने वालों में भी अन्य मूलभूत कौशल न होना, विश्लेषण क्षमता का अभाव, समाज के प्रति जिम्मेदारी का अभाव, नैतिक व अनैतिक में भेद न होना, चारित्रिक कमियां आदि दिखाई देती हैं। आज कोचिंग की अनौपचारिक शिक्षण व्यवस्था के अंतर्गत डमी स्कूलों की व्यवस्था प्रायोगिक विषयों को मात्र औपचारिकता बनाने तथा स्कूलों में वांछित क्षमता के शिक्षकों की उपलब्धता न होने से माध्यमिक शिक्षा तेजी से पतन की ओर अग्रसर है जिसका सीधा प्रभाव उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की अनुपयुक्तता से प्रमाणित होता है। आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों को नियंत्रित करने वाले बोर्ड कक्षाओं में गुणवत्ता परक शिक्षा-प्रशिक्षण कार्यों को संपादित कराते हुए छात्र-छात्राओं के अंदर ज्ञान आधारित क्षमताओं का इतना विकास कराएं कि शिक्षार्थियों को किसी सूरत में किसी अनैतिक मार्ग से परीक्षाफल बेहतर करने के विचार पैदा ही न हों। प्राथमिकता व माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था को सम्मिलित रूप से छात्र-छात्राओं के समग्र विकास के लिए विद्यमान पाठ्यक्रम का इमानदारी से शिक्षकों के माध्यम से क्रियान्वित कराना चाहिए।

कोचिंग संस्थानों के शिक्षकों के प्रयासों से उन्हीं शिक्षार्थियों के स्तर से उत्कृष्ठ प्रदर्शन करना इस बात का प्रमाण है कि शिक्षक यदि तय कर ले तो देश की शिक्षा व्यवस्था की सूरत बदली जा सकती है तो यह पहल स्कूलों के प्रबंधन व शिक्षकों के स्तर से क्यों नहीं की जानी चाहिए। सरकार के स्तर से समाज निर्माण में शिक्षकों की भूमिका के मद्देनजर उनकी कार्यक्षमता को उच्चकोटि का रखने के प्रयास किए जाने चाहिए और शैक्षणिक व्यवस्था में लगे समस्त अंगों को सर्वाधिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से कार्य कराने की कार्ययोजना बनानी चाहिए। समूचे देश में शिक्षा के स्तर को केंद्रीय रूप से नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए शिक्षा बोर्डों के सामने यह मती चुनौती है कि वे देश भर में फैले स्कूलों में गुणवत्ता परक शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यों को कैसे सुनिश्चित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप ही शिक्षार्थियों की नैतिकता पर हो रहे प्रहार को रोका जा सकेगा और कोचिंग तंत्र के माध्यम से सशक्त हो रहे अनौपचारिक व समानांतर शिक्षा व्यवस्था के उद्भव के चलते शिक्षा के व्यावसायीकरण पर अंकुश लग सकेगा।

 

नोटः ये लेखक के निजि विचार हैं। लेखक मदन मोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलजी, गोरखपुर के पूर्व कुलपति व हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विश्वविद्यालय , कानपुर में यांत्रिक अभियंत्रण के आचार्य हैं।

Ajay Chaturvedi
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