
श्रावणी उपाकर्म करते ब्राह्मण (फाइल फोटो)
वाराणसी. पूर्णिमा तिथि के दो दिनों में विभक्त हो जाने के कारण इस वर्ष श्रवणी का पर्व भी दो दिन मनाया जाएगा। शुक्ल यजुर्वेदी ब्राह्मण वेदानुसार तीन प्रहर की पूर्णिमा में ही श्रावणी करते हैं अत: वे 11 अगस्त को श्रावणी उपाकर्म करेंगे। सामवेद और अथर्व वेद को मानने वाले ब्राह्मण उदयातिथि के अनुसार श्रावणी करते हैं। ऐेसे में वो इस विधान का संपादन 12 अगस्त को करेंगे। वहीं ऋग्वेदी ब्राह्मण भाद्र कृष्ण पंचमी तिथि पर श्रावणी उपाकर्म करेंगे।
11 अगस्त को सुबह 09:35 बजे लगेगी पूर्णिमा
भृगु संहिता विशेषज्ञ पं. वेदमूर्ति शास्त्री ने बताया कि पूर्णिमा की तिथि 11 अगस्त को सुबह 09:35 बजे लगेगी और 12 अगस्त को सुबह 07:17 बजे तक ही रहेगी। 12 अगस्त को पूर्णिमा सूर्योदय के कुछ घंटों बाद तक ही मिल रही है इसके चलते सामवेदी और अथर्ववेदी ब्राह्मणों को श्रावण उपाकर्म का विधान सुबह 07:17 बजे के पहले ही पूर्ण कर लेना होगा। बता दें कि श्रावण पूर्णिमा पर ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी उपाकर्म करने का विधान है। यह क्रिया पवित्र नदी के घाट पर सामूहिक रूप से की जाती है।
श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष
श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष हैं, प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प सबसे पहले किया जाता है। गुरु के सान्निध्य में गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद दूसरे चरण में ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहते हैं, आत्म संयम का संस्कार है, जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वो पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं। इस संस्कार को व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है। उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है।
सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है श्रावणी उपाकर्म
इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।
प्रदोषकाल में मना सकते हैं रक्षाबंधन
वैसे भले ही श्रावण पूर्णिमा का मान दो दिन हो रहा हो लेकिन रक्षाबंधन का पर्व 11 अगस्त को ही मनाया जाएगा। यही तिथि शास्त्र सम्मत है। धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु आदि धर्मग्रंथों में दिए गए आख्यानों के आधार पर इस वर्ष 12 अगस्त को रक्षाबंधन का पर्व मनाना उचित नहीं होगा। भद्रा की अविध अत्यधिक लंबी होने के कारण पूर्ण शुभ मुहूत रात्रि 08:25 के बाद मिलेगी। लेकिन तीन प्रहर बीतने के बाद भद्रा शुभफलदायी हो जाएगा। ऐसे में प्रदोष काल में भी रक्षा बंधन आरंभ किया जा सकता है।
रक्षाबंधन के लिए उदयातिथि की पूर्णिमा अशुभ मानी जाती है
भृगु संहिता विशेषज्ञ पं. वेदमूर्ति शास्त्री के अनुसार रक्षाबंधन के लिए उदया तिथि की पूर्णिमा अशुभ मानी जाती है। 11 अगस्त को पूर्णिमा तिथि की शुरुआत सुबह 09:35 बजे होगी और उदय काल से ही भद्रा भी आरंभ हो जाएगा। उस दिन चंद्रमा मकर राशि में रहेगा। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चंद्रमा यदि कन्या, तुला, धनु और मकर राशि में से किसी एक में रहता है तो उस दिन पाताल में भद्रा होता है। पाताली भद्रा तीन प्रहर के बाद धरती पर शुभफलदायी हो जाता है। इस आधार पर प्रदोष काल में सायं पांच से छह बजे के बीच रक्षा बंधन किया जा सकता है। ऋषिकेष पंचांग के अनुसार भद्रा की समाप्ति रात्रि 08:25 बजे होगी। वहीं विश्व पंचांग के अनुसार भद्रा की शुरुआत सुबह 09:44 बजे होगी और समापन रात्रि 8:34 बजे होगा। मारवाड़ी समाज के लोग सूड़ जिमाने की परंपरा का निर्वाह भी प्रदोष काल में कर सकते हैं।
Published on:
04 Aug 2022 06:49 pm
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