
अवधेश राय की हत्या 3 अगस्त 1991 को वाराणसी में गोली मार कर कर दी गई थी। अवधेश कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक अजय राय के भाई थे।
आइए सबसे पहले अजय राय की कहानी को जानते हैं जिन्होंने मोदी के खिलाफ 2 बार लड़ा चुनाव
प्रधानमंत्री मोदी को लोकसभा चुनाव में 2 बार चुनौती देने वाले जमीनी नेता अजय राय को अजय राय का राजनीतिक सफर साल 1993 से शुरू होता है जब वह बीजेपी की बड़ी नेताओं में शामिल कुसुम राय के संपर्क में आए। इसके साथ ही उन्होंने भाजयुमो के अध्यक्ष रामाशीष राय का भी समर्थन हासिल किया और वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हो गए।
साल 1996 में भाजपा ने पहली बार उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी और वह जिम्मेदारी थी कोलअसला विधानसभा में वामपंथ के गढ़ को ध्वस्त करने की।
दरअसल बात यह थी कि कोलअसला सीट पर लगातार 9 बार से CPI के बड़े नेता रहे ऊदल का कब्जा था। लेकिन अजय राय ने ऊदल के उस वर्चस्व को समाप्त कर पहली बार साल 1996 में भगवा परचम फहराया। जीत का अंतर भले ही महज 484 वोटों का था, लेकिन जीत के मायने बड़े थे। इस जीत के साथ अजय राय ने जहां पार्टी की झोली में एक नई विधानसभा डाल दी वहीं अपने अतीत की बाहुबली की छवि को भी काफी हद तक बदलने में कामयाब हुए।
इन दोनों लिहाज से इसे बड़ी जीत बताया गया। अजय राय ने इसके बाद बीजेपी के सीट पर साल 2002 और 2007 के दोनों चुनावों को आसानी से जीत लिया। कोलअसला सीट उसके बाद अजय राय के नाम से जानी जाने लगी।
अजय राय का सियासी सफर एक तरफ जहां आगे बढ़ रहा था। वहीं, वह अपने भाई अवधेश राय की हत्या का मुकदमा भी लड़ रहे थे। 23 नवंबर साल 2007 को जब अजय राय वाराणसी कोर्ट में गवाही के लिए गए, तो बाहर निकलने के दौरान उनपर हमला हुआ। गोलियां चलीं, लेकिन अजय राय बच गए।
बाद में अजय राय ने मुख्तार अंसारी, राकेश, कमलेश और भीम सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया था। तीन बार के विधायक अजय राय को अब सियासत में बड़ी भूमिका की तलाश थी और तभी 2009 लोकसभा चुनाव का वक्त आ गया।
लोकसभा का टिकट नहीं मिलने पर पार्टी और विधायकी दोनों छोड़ा
अजय राय बीजेपी से टिकट चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें अनसुना कर दिया। पार्टी ने तब डॉ मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी से उम्मीदवार बना दिया गया। यह अजय राय को नागवार गुजरा और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। साथ ही विधानसभा से भी इस्तीफा दे दिया।
बीजेपी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने सपा का दामन थाम। सपा ने उनके मन की मुराद पूरी कर दी। उन्हें डॉ जोशी और राय के कट्टर विरोधी मुख्तार अंसारी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए वाराणसी संसदीय सीट से मैदान में उतार दिया।
वह साल 2009 का वाराणसी का लोकसभा चुनाव भी यादगार बन गया। अंतिम वक्त में हुए मतों के ध्रुवीकरण में डॉ जोशी ने जीत हासिल की और बसपा प्रत्याशी मुख्तार अंसारी लगभग 17 हजार वोटों से हारकर दूसरे नंबर पर रहे। लेकिन यहां भी अजय राय ने अपनी ताकत दिखा दी। उन्होंने तब बनारस के सीटिंग एमपी कांग्रेस के डॉ राजेश मिश्र को पीछे करके तीसरे नंबर पर पैर जमा लिया।
लोकसभा चुनाव हारने के बाद अजय राय फिर कोलअसला विधानसभा क्षेत्र की ओर लौटे। इस सीट पर उपचुनाव हुआ जिसमें अजय राय ने निर्दल दावेदारी पेश की। कारण लोकसभा हारने वाले अजय राय ने सपा का दामन भी छोड़ दिया। लेकिन कोलअसला में उनका दबदबा कायम रहा और उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी जीत हासिल कर ली।
उसी वक्त कांग्रेस के दिग्गज राजेशपति त्रिपाठी ने उनसे संपर्क साधा। त्रिपाठी ने बेहतरीन तरीके से राय की पैरवी दिल्ली में गांधी परिवार से की। हालांकि बनारस कांग्रेस का एक खेमा अजय राय को कांग्रेस में आने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगा चुका था। लेकिन तब तत्कालीन यूपी प्रभारी दिग्विजय सिंह के मार्फत औरंगाबाद हाउस यानी पंडित कमलापति त्रिपाठी के पौत्र ने सलीके से बिसात बिछाई जिसका नतीजा रहा कि अजय राय कांग्रेस में शामिल हो गए।
साल 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले लोकसभा व विधासभा क्षेत्रों का परिसीमन हुआ और कोलअसला का नाम बदलकर पिंडरा कर दिया गया। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा और अजय राय ने पिंडरा विधानसभा सीट पर कांग्रेस का झंडा बुलंद कर दिया। इसके बाद तो अजय राय पूरी तरह से कांग्रेसी हो गए।
भाई के हत्यारे मुख़्तार से हाथ मिलाया, बिरादरी और घर में इसका विरोध झेलना पड़ा
दो साल बाद साल 2014 का लोकसभा चुनाव आ गया और पार्टी ने उन्हें भाजपा प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के खिलाफ टिकट देकर बड़ा दांव खेला। राय कांग्रेस के उम्मीदवार तो हो गए पर कांग्रेस ने राय के प्रबल प्रतिद्वंद्वी मुख्तार अंसारी से हाथ मिला लिया। बस क्या था, पूरे संसदीय क्षेत्र में अजय राय और मुख्तार की दोस्ती के पर्चे छप गए।
नतीजन राय को अपनी बिरादरी और घर में विरोध भी झेलना पड़ा। चुआव में अजय राय बुरी तरह से हार गए। वह मोदी, और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के बाद तीसर नंबर पर रहे। लेकिन कांग्रेस के प्रति लिए उनकी वफादारी बनी रही।
पार्टी के नेता के तौर पर उन्होंने अक्टूबर 2015 में गंगा में गणेश प्रतिमा विसर्जन रोकने के सपा सरकार के निर्णय के विरुद्ध लड़ाई लड़ने वाले शंकराचार्य स्वरूपानंद के शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद पर हुए लाठीचार्ज के विरुद्ध निकली संतों की न्याय यात्र में शामिल क्या हुए और उस न्याय यात्रा के समापन पर जो हिंसा हुई उसका जिम्मेदार सरकार ने अजय राय को ठहरा दिया और उन्हे रासुका के तहत निरुद्ध कर जिला बदर तक कर दिया।
वह करीब 9 महीने तक जेल में रहे। फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अजय राय पर लगा रासुका हटा लिया और तब वो रिहा हो सके।
पार्टी के साथ वह लगातार सड़क पर नजर आए। हर छोटे-बड़े मुद्दों को उठा कर विरोध किया। नतीजन 2019 में फिर एक बार पार्टी ने उन पर भरोसा जताया और मोदी के खिलाफ दूसरी बार मैदान में उतार दिया। इस बार भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा और वह फिर से तीसरे नंबर पर आए पर वोट परसेंटेज में इजाफा जरूर कर लिया।
Published on:
05 Jun 2023 04:54 pm
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