अहमदाबाद. पश्चिम बंगाल से दो हजार किलोमीटर दूर गुजरात के अहमदाबाद शहर में बसे बंगाल के लोग आज भी अपनी संस्कृति और मिट्टी से जुड़े हुए हैं। इसका पता यहां होने वाली दुर्गा पूजा में देखने को मिलता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां सजने वाले दुर्गा पूजा पांडाल में बंगाली संस्कृति की झलक तो दिखती ही है साथ ही यहां बंगाल की ही मिट्टी से दुर्गा पूजा के लिए इकोफ्रेंडली प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। इतना ही नहीं बंगाल से आए कारीगर ही एक से दो महीने यहां रहकर इन प्रतिमाओं को तैयार करते हैं। सबसे विशेष बात यह है कि मां दुर्गा का मुखड़ा बंगाल से लाई गई मां गंगा की चिकनी मिट्टी से तैयार किया जाता है।
पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले से आए कारीगर ननीगोपाल बनर्जी ने बताया कि उन्होंने अहमदाबाद में इस वर्ष चार जगहों के लिए मां दुर्गा व अन्य प्रतिमाएं तैयार की हैं। इनमें एयरपोर्ट के पास एयरपोर्ट कम्युनिटी हॉल में, साबरमती रेलवे कोलोनी में, वस्त्रापुर और गांधीनगर के घरों में भी प्रतिमाएं तैयार की हैँ। वे करीब ढाई महीने से साथी कारीगर को लेकर यहां आए हैं।
ननीगोपाल ने बताया कि दुर्गा पूजा के लिए प्रतिमाओं को तैयार करने में मिट्टी, धान पूड़े को उपयोग में लेते हैं। इन्हें रंगा भी इकोफ्रेंडली रंगों से जाता है, ज्यादातर रंग वे खुद तैयार करते हैं।ऐसा ही कहना है नवरंगपुरा में भारत सेवा आश्रम में दुर्गा पूजा के लिए प्रतिमाओं को तैयार करने वाले पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के अमलता निवासी कारीगर प्रकाश राम का। उन्होंने बताया कि गंगा की मिट्टी चिकनी होती है, जिससे प्रतिमाओं की फिनिशिंग गंगा की मिट्टी से दी जाती है। स्थानीय मिट्टी का भी उपयोग किया जाता है। प्रतिमाओं का रंगरोगन भी प्राकृतिक रंगों से किया जाता है। प्रकाश राम बताते हैं कि वे और उनके पिता विश्वनाथ राम बीते कई सालों से अहमदाबाद में दुर्गा पूजा के लिए प्रतिमा बनाने आते हैं।
गंगा की पवित्र चिकनी मिट्टी से बनता है मां का चेहरा
ननीगोपाल व प्रकाश राम बताते हैं कि बंगाल से लाई गई गंगा की चिकनी मिट्टी को वे बंगाल से ही साथ लेकर अहमदाबाद आते हैं। विशेषरूप से शेर पर सवार मां दुर्गा का चेहरा और अंगुलियां उसी चिकनी मिट्टी से बनाते हैं। भगवान गणपति, भगवान कार्तिकेय, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती की प्रतिमा बनाने में भी इस मिट्टी का उपयोग होता है। सभी प्रितिमाओं की फिनिशिंग में इस मिट्टी का उपयोग होता है। मां दुर्गा के लिए शेर, गणपति के लिए मूषक, कार्तिकेय के लिए मोर, मां लक्ष्मी के लिए उल्लू, मां सरस्वती के लिए हंस की प्रतिमा भी बनाते हैं।