बांसवाड़ा. प्रदेश के बजट में माही नदी को लूणी नदी से जोड़ने के साथ ही माही बांध व नर्मदा नहर की संयुक्त परियोजना का सर्वे कराकर पश्चिम राजस्थान केनाल परियोजना की डीपीआर तैयार कराने की घोषणा की गई है। जबकि माही नदी बेसिन संबंधी ट्रिब्यूनल के गठन व राज्यों की सहमति बगैर माही और लूणी नदी का जुड़ाव संभव नहीं है।
राज्य की भौगोलिक दृष्टि से माही नदी मध्यप्रदेश से होकर प्रदेश के दक्षिण जिले बांसवाड़ा व डूंगरपुर से होकर गुजरात में बहती है, वहीं लूणी नदी प्रदेश के पश्चिमी जिलों में बहती है। माही नदी को सीधे तौर पर स्वभाविक और नैसर्गिक रूप से लूणी नदी के साथ नहीं जोड़ सकते हैं। दोनों नदियों के मध्य अरावली पर्वत श्रृंखलाएं है। वहीं माही एक अन्तरराज्यीय नदी है, जिसका दोहन अन्य राज्यों की सहमति के संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त माही नदी बेसिन जल दोहन व उपयोग को लेकर भी किसी ट्रिब्युनल का गठन नहीं हुआ है। ऐसे में सर्वाधिक हानि राजस्थान को व लाभ गुजरात को हो रहा है। इन परिस्थितियों में मध्यप्रदेश व गुजरात की सहमति के बिना दो अलग-अलग दिशाओं में बहने वाली नदियों को जोड़ने जैसे वृहद प्रकल्प की अवधारणा बेमानी है।
यह बनाई थी फिजीएबीलिटी रिपोर्ट
माही बेसिन के अधिशेष पानी को लूणी नदी बेसिन में ग्रैविटी के माध्यम से अपवर्तन संभव है। इसे लेकर 1986-88 में माही-अनास-साबरमती डायवर्जन प्रकल्प की फिजीएबीलिटी रिपोर्ट माही के तत्कालीन मुख्य अभियंता की ओर से तैयार करवाई गई थी। इस महत्वाकांक्षी योजना में अनास बांध व बेणेश्वर बांधों का निर्माण कर माही नदी के अधिशेष पानी को रोककर, अनास नदी पर एक्वेडक्ट बनाकर सागवाडा तहसील से 259 किलोमीटर लम्बी माही-अनास-साबरमती टनल से जालोर की भीनमाल तहसील में पहुंचाने का प्रावधान किया था। इसके अतिरिक्त टनल के रास्ते में पड़ने वाली साबरमती व पश्चिमी बनास नदी बेसिनों की 6 नदियों ( वाकल, सई, पामरी, साबरमती आदी के अधिशेष पानी को भी टनल में डालने का प्रावधान था।
जल उपलब्धता का आंकलन गौण
फिजीएबीलिटी रिपोर्ट बने करीब 35 वर्ष हो चुके हैं। इतनी लंबी अवधि में परिस्थितियां व अधिशेष जल उपलब्धता का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। अनास नदी बेसिन में मध्यप्रदेश व गुजरात ने कई लघु प्रकल्पों का निर्माण किया है। माही सिंचित क्षेत्र विस्तारित करने के नए प्रकल्प लाए जा रहे हैं। साबरमती बेसिन का दोहन प्रगति पर है। वाकल व सई आदि के अधिशेष पानी को जवाई बांध में डालने की योजना तैयार है और इसकी कुछ संरचनाओं पर कार्य प्रारंभ किया जा रहा है। ऐसे में 35 वर्षों पूर्व अधिशेष जल उपलब्धता का किया गया आकलन अब गौण और माही-लूणी डायवर्जन प्रकल्प वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बेमानी हो चुका है।
यह बोले विशेषज्ञ
इस मामले में जल संसाधन विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता दीपक दोसी का कहना है कि राजस्थान राज्य गुजरात से माही बांध को लेकर हुए समझौते के अनुसार अपने हिस्से का 70 टीएमसी माही जल वापस प्राप्त कर लें तो कडाना बांध से सुजलाम-सुफलाम नहर द्वारा संज्ञान योग्य जल जालोर व बाड़मेर जिलों को उपलब्ध करवाया जा सकता है, जिससे नर्मदा जल पर दबाव कम होगा। राजस्थान व गुजरात के मध्य द्विपक्षीय समझौते का समाधान किए बिना ठोस कार्य संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि अनास बांध अधिशेष पानी रोकने का एकमात्र बड़ा प्रकल्प है। इसके लिए गुजरात व मध्यप्रदेश स्वीकृति आवश्यक है। इसके अतिरिक्त बड़े बांध निर्माण के लिए उपयुक्त साइट भी नहीं है। दरअसल बजट घोषणा जालोर के आंदोलनरत किसान संगठनों को डीपीआर के बहाने आश्वस्त करने का प्रयास है।