बिलासपुर – बढ़ती जनसँख्या और तेजी से ख़तम होती हरियाली के बीच एक ऐसे बिलासपुरियन है जिन्होंने अपने टैरेस पर अपने लिए फल और शुद्ध वातावरण की व्यवस्था कर ली है। रिंग रोड चंदेला नगर निवासी कॉलिंस ने अपने टैरेस को एक गार्डन में तब्दील कर दिया है। केनेथ कॉलिंस कहते है कि शहर में बीते दशक में तेजी से हो रहे निर्माण कार्य के चलते पेड़ पौधों की जगह कंक्रीट की इमारतों ने ली है। ऐसे एक ओर जहां हरियाली कम हो रही है वहीं दूसरी और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है। इसी को देखते हुए उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपने टैरेस पर गार्डनिंग करेंगे। जिससे प्रकृति को कम से कम अपने परिवार के जरुरत जितनी ऑक्सीजन का सहयोग दे सके।
केनेथ कॉलिंस बताते है की उन्होंने कोरोना काल के दौरान इसकी शुरुआत की थी। उनका कहना है की प्रकृति हमसे कुछ नहीं मांगती सिर्फ देती है। इसके बदले में हमें सिर्फ इसके दोहन से बचना होगा। केनेथ ने सबसे पहले अपने छत पर अलग अलग तरह की सब्जिया लगाई। पुरे कोरोना काल के दौरान उन्होंने खुद से उगाई गई सब्जिया खाई और अपने पड़ोसियों को भी खिलाई। लेकिन सब्जियों में लगने वाले कीड़ो की समस्या को देखते हुए अब वह फलदार पेड़ो की गार्डनिंग कर रहे है। आज कॉलिंस की टैरेस पर रेड बेर्री, सहतूत, आम, अमरुद, निम्बू, माल्टा, अंगूर और अनार जैसी कई तरह की फलदार पेड़ मौजूद है।
पूरी तरह से आर्गेनिक फलों का ले रहे आनंद
आज के समय में फलो की खेती से लेकर उन्हें पकाने तक केमिकल का इस्तमाल किया जाता है। इससे उनके स्वाद पर असर तो पड़ता ही साथ ही साथ ऐसे फल हमारे शरीर के लिए नुकसान दायक भी होते है। वही केनेथ अपने टैरेस गार्डनिंग के लिए किसी भी तरह के केमिकल फ़र्टिलाइज़र का इस्तमाल नहीं करते है। उन्होंने बताया की इन पेड़ो के लिए वह खुद गोबर, बेसन, गौमूत्र, दही और गुड़ की सहायता से खाद त्यार करते है। इससे उनके फलो का स्वाद और भी बढ़ जाता है और इसके कई हेल्थ बेनिफिट भी है।


जरा से प्रयास से हम अपने शहर को ग्रीन सिटी बना सकते है
महज तीन साल के अंदर ही अपने टैरेस पर फलदार पेड़ो की गार्डनिंग कर रहे कॉलिंस का कहना है कि हम शहरवासी मिलकर इस शहर को फिर से हरा भरा बना सकते है। यह बिकुल सही बात है की आज के भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में इंसान के पास समय की कमी है। लेकिन अगर हम अपने आने वाली जनरेशन के लिए सोचे तो ऐसे एफर्ट हमारे पीछे आने वाली जनरेशन के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनेंगे। इससे आने वाली जनरेशन भी पेड़-पौधों का महत्त्व समझेगी।