बूंदी. सिलोर स्थित जैन मंदिर में सुबह मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के सानिध्य में शांति धारा हुई। इसके बाद मुनि महासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सहयोग के लिए योग है, संयोग है तो वियोग है। योग है तो उस वस्तुओं को अपना क्यों मानना स्वार्थ मोह के कारण लड़ाई लडऩा को कुबुद्धि कहलाती है। कोई व्यक्ति अपने साथ कुछ नहीं लेकर जा सकता, फिर भी लड़ाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कर्म के आगे किसी की नहीं चलती। कर्म हमेशा परछाई की तरह चलता है। उन्होंने कहा कि कर्म सम्यक दृष्टि व्यक्ति से नहीं व्यक्तित्व से बनता है। उन्होंने कहा कि चिंतन के बगैर वैराग्य नहीं आ सकता। आत्मा के स्वरूप का चित्रण करते हुए कहा कि आत्मा की अनुभूति करना आवश्यक है। जो पर को अपना माने वह मिथ्या दृष्टि नहीं। निज को अपना मानने वाला सम्यक दृष्टि है। स्वाध्याय करने से तत्वज्ञान की उपलब्धि हो जाती है। मनुष्य के जीवन में चमकता वीतराग से आती है। जैन धर्म में गुणों को नमस्कार किया गया है। राग की दशा से ऊपर उठकर वीतरागता तक जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोक्ष शरण भूत शाश्वत शुभ है।