
छतरपुर। जिले के छोटे से कस्बे लवकुशनगर में जन्में 28 वर्षीय वैभव त्रिवेदी को यूपीएससी ऑल इंडिया में 327वीं रैंक हासिल हुई। वैभव अब आईआरएस बनकर देश की सेवा करेंगे। वैभव के पिता बीडी त्रिवेदी समीपवर्ती ग्राम अक्टौहां में प्रधान अध्यापक हैं तो वहीं उनकी माताजी शांति त्रिवेदी लवकुशनगर तहसील कोर्ट में अधिवक्ता हैं। तीन बहिनों के अकेले भाई वैभव की यह सफलता पूरे जिले को गौरवान्वित कर रही है। नतीजे आने के बाद लोग मिठाई लेकर घर पहुंच रहे हैं और वैभव के मोबाइल की घंटी बधाई संदेश के कारण थम नहीं रही है। दूसरे प्रयास में ही सफलता पाने वाले वैभव ने ढाई साल तक फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम नहीं चलाया। राजोना 7 से 8 घंटे पढ़ाई के साथ ही नजरिया विकसित करने पर जोर दिया।
लक्ष्य पाने के लिए बड़ा पैकेज छोड़ा
वैभव बताते हैं कि उन्होंने 2018 में भी यूपीएससी का पहला एग्जाम दिया था और इसके बाद 2019 में और अधिक तैयारी करके परीक्षा दी थी। मुझे उम्मीद थी कि इस बार सिलेक्शन जरूर होगा, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि रैंक इतनी बेहतर होगी। हालांकि मैं अब भी एक प्रयास और करूंगा ताकि रैंक में सुधार हो और आईएएस के लिए चुना जाऊं। यूपीएससी की परीक्षा देने का सपना तो शुरूआत से ही था लेकिन फिर भी मैं प्राइवेट जॉब करने लगा। कंपनी एक बढिय़ा पैकेज दे रही थी, इसलिए कई बार मन में दुविधा हुई लेकिन फिर परिवार से पूछा तो परिवार ने दुविधा त्यागकर लक्ष्य पर केन्द्रित रहने की सलाह दी। इस तरह मैंने नौकरी छोड़ी और फिर तैयारी करने लगा। मेरा मानना है कि दुविधाओं के साथ लक्ष्य पूरे नहीं किए जा सकते।
हार्ड वर्क बहुत जरूरी है
उन्होंने बताया कि मैंने 5वीं तक की पढ़ाई लवकुशनगर के शिशु मंदिर से की है। इसके बाद जवाहर नवोदय विद्यालय नौगांव में 12वीं तक पढ़ाई की। इसके बाद बनारस आईआईटी से बीटेक और एमटेक करने के बाद गुडग़ांव चला गया था। गुडग़ांव में ओयो कंपनी में तकरीबन 11 लाख से अधिक के वार्षिक पैकेज पर दो साल नौकरी की। इसके बाद नौकरी छोड़ दी। किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए फोकस बहुत जरूरी है। यूपीएससी आपसे नियमित अध्ययन मांगती है। मैं प्रतिदिन 7 से 8 घंटे पढ़ता था, पढऩे के अलावा अपना नजरिया विकसित करने के लिए करेंट अफेयर्स के प्रति सोच बनाना और उसकी हैंडलिंग के विषय में सोचने वाला एप्टीट्यूट लाना होता है। हार्ड वर्क तो सबसे जरूरी है ही।
छोटे शहर अब कामयाबी में नहीं बनते अड़चन
वैभव का कहना है कि पहले के मुकाबले अब छोटे शहर इतनी बड़ी रूकावट नहीं है क्योंकि अब हर जगह पर ग्लोबल नॉलेज पाने के अवसर खुले हैं लेकिन टेलेंट को सही एक्सपोजर देने के लिए बड़े शहरों में पढऩा जरूरी होता है। यहां एक माहौल मिलता है साथ ही एक्सपर्ट लोग मिलते हैं।