
बांदीकुई. नक्काशीदार पत्थरों से बनी आभानेरी की चांदबावड़ी एवं हर्षद माता मंदिर पर्यटन के क्षेत्र में देश विदेश में पहचान बना चुके हैं। यह बावड़ी आने वाले विदेशी पावणों को लुभा रही है। चीन, जापान, इंग्लैण्ड एवं अफ्रीका सहित विभिन्न देशों के प्रतिदिन 250 से 300 सैलानी भ्रमण पर आते हैं, जो कि चांदबावड़ी के इतिहास की जानकारी लेकर जाते हैं। इसके अलावा ग्रामीण परिवेश का भी भ्रमण करते हैं।
अब पुरातत्व व पर्यटन विभाग की ओर से ई-टिकिट योजना भी चालू किए जाने की तैयारी की जा रही है। इससे काफी हद तक विकास को गति मिल सकेगी। इस स्मारक को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घो षित किया जा चुका है। संरक्षित सीमा से 100 मीटर तक एवं इससे आगे 200 मीटर तक खनन एवं निर्माण पर प्रतिबंध है।
गाइड विजय सांवरिया ने बताया कि आभानेरी में भूल भुलैया, दॉ फॉल एवं भूमि सहित कई वॉलीवुड़ एवं हॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। पर्यटन दिवस पर ग्रामीण सैलानियों का राजस्थानी परम्परा से स्वागत भी करते हैं।
ये है पर्यटन स्थल का इतिहास
चांदबावड़ी का निर्माण 8वीं-9वीं सदी में निकुंभ राजवंश के राजा चांद (चन्द्र) ने किया था। राजा चांद आभानगरी पर शासन करता था। इसके बाद इसका नाम आभानेरी पड़ गया। करीब 19.5 मीटर गहरी यह बावड़ी योजना में वर्गाकार है। इसका प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है। नीचे उतरने के लिए तीनों तरफ से दोहरे सोपान है। उत्तरी भाग में स्तम्भों पर बहुमंजिली दीर्घा बनाई गई है। इस दीर्घा में प्रक्षेपित दो मण्डपों में महिषासुर मर्दनी एवं गण्ेश की सुंदर प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं।
बावड़ी का प्रकार पाŸव बरामदे एवं प्रवेश मण्डप मूल योजना में नहीं था। ऐसे में इनका निर्माण बाद में किया गया। लोगों का कहना है कि चांदबावड़ी को अंधेरे में उजाले की बावड़ी भी कहते हैं। क्योंकि चांदनी रात में यह बावड़ी सफेद दिखाई देती है। बावड़ी तक पहुंचने के लिए करीब साढ़े तीन हजार सीढियां है। इन सीढिय़ों को भूल भैलया सीढ़ी भी कहा जाता है। क्योंकि जिन सीढिय़ों से उतरते हैं, उन सीढिय़ों से वापस बावड़ी से बाहर आना मुश्किल होता है। बताया जाता है कि इस बावड़ी में सुरंगनुमा गुफा भी है और एक ही रात में इस बावड़ी का निर्माण किया गया था।
चांदबावड़ी के समीप ही हर्षद माता का मंदिर स्थित है। जो कि महामैरू शैली के रूप में हैं। इसका पूर्वाभिमुख मंदिर दोहरी जगती पर स्थित है। मंदिर योजना में पंचरथ गर्भगृह प्रदक्षिणापथयुक्त है। जिसके अग्रभाग में स्तम्भों पर आधारित मण्डप है। गर्भगृह एवं मण्डप गुम्बदाकार छतयुक्त है। इसकी बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमाए उत्कीर्ण हैं।