फिरोजाबाद। घर का मुखिया वैसे तो पुरूष होता है लेकिन यमुना क्षेत्र के गांवों में रह रहीं महिलाओं ने कमाई में पुरूषों को पीछे छोड दिया है। गलीचा बनाने का काम कर रहीं ये महिलाएं मोटी रकम कमाकर परिवार का भरण पोषण करने का काम करती हैं। गलीचा बनाने में गांव के बच्चे भी पूरी भूमिका निभाते हैं। घर के पुरूष बाहर मेहनत मजदूरी करने जाते हैं तो यहां की महिलाएं घर का काम काज करने के बाद गलीचा बनाने के काम में जुट जाती हैं। महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वह पढी लिखी न होने के बाद भी किसी बात में पीछे नहीं हैं।
चार दशक पहले शुरू हुआ था काम
गलीचा बनाने का काम यमुना की खादरों में बसे गांवों में करीब चार दशक पहले शुरू हुआ था। घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए महिलाओं ने गलीचा बनाने का काम सीखा और धीरे-धीरे परिवार की मददगार बन गई। रसूलाबाद की बाग ठार गोला निवासी लक्ष्मी के दो पुत्र व दो पुत्री चार संतानें हुई। थोड़ी सी जमीन ही परिवार के पालन का सहारा थी। पति मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करता था। अचानक पति को बीमारी ने घेर लिया तो परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया। घर का खर्च चलाने के लिए खेत की आमदनी भी कम पडऩे लगी। तो लाज शर्म छोड़कर घर के बाहर कदम रखा। गलीचा बनाने का काम सीखा। चैदह साल का बेटा भूरी सिंह व 13 साल की बेटी रजनी भी हुनर सीख परिवार चलाने में सहयोग कर रहे हैं। सुबह पढऩे के बाद दोनों दोपहर में मां के साथ हाथ बटाते हैं। यह कहानी सिर्फ लक्ष्मी की नहीं है। गांव की ही कमलेश, संगीता का भी हाल जुदा नहीं हैं। पति का कमाई से घर नहीं चल रहा। वह भी गलीजा बनाने लगी है। अब दोनों की कमाई से घर का खर्च चलता है। बेटियों को भी यह काम सिखाया है। रसूलाबाद गांव में भले ही तमाम महिलाओं ने शिक्षा के मंदिर का रूख नहीं किया हो लेकिन हुनर में वह पारंगत हैं। श्री देवी, पुष्पा, सीमा व गीता को ही देखें यह स्कूल नहीं गईं लेकिन उनकी कला के सब कायल हैं। अशिक्षा के अंधेरे का दर्द उन्होंने अपने हुनर से दूर किया है। सिर्फ एक रसूलाबाद ही नहीं बल्कि गदलपुरा, पीपरिया, बाग ठार गोला, कॉलोनी, बालमपुर, गढी थानी, बझेरा, घुरकुआ, कुर्रा, कसोंदी सहित दर्जन गांवों में गलीचा कारोबार ने महिलाओं को स्वावलंबी बना दिया। इस क्षेत्र में धागे से कला बांटने वाले मुन्नीलाल कई गरीब परिवारों को जिंदगी की राह दिखा चुके हैं। यहां के बने गलीचे देश में ही नहीं बल्कि विदेश तक अपनी पहचान रखते हैं।
खुद मेहनत कर पढ़ा रहीं हैं भाइयों को
खुद को गरीबी के चलते पढ़ नहीं सकीं, मगर हाथ में आए हुनर ने कुछ आर्थिक मदद दी, तो उन्होंने अपने भाई को पढ़ाने की ठानी है। गांव रसूलाबाद में रहने वाली 14 वर्षीय बबिता एवं 12 वर्षीय रीना घर पर कालीन बनाने का काम करती हैं। यह दोनों अपने छोटे भाइयों को स्कूल भेज रही हैं। इनका कहना है कि हमारी मेहनत से भाई पढ़ लिखकर कुछ बन जाए।
साहूकारों के चंगुल से निकले हुनर
ग्रामीणों की कला साहूकारों के चंगुल में फंसी है। सरकारी मदद न मिल पाने से हुनर का लाभ साहूकार उठा रहे हैं। ठेकेदार के बताए डिजाइन को ही महिला व पुरूष तैयार करते हैं। अपना कारोबार शुरू करने के लिए लाखों की जरूरत रोड़ा बनी है। कुछ ने ऋण लेने का भी प्रयास किया लेकिन बैंक में पहुंचते ही सपने जमींदोज हो गए। ऐसे में आगरा के ठेकेदारों से कच्चा माल लेकर मजदूरी पर इनका काम हो रहा है। यहां के बने कालीन जर्मन में घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं।