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पटाखे फोड़ने संबंधी प्रतिबंध पटाखों के धुएं में उड़े
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पटाखे फोड़ने संबंधी प्रतिबंध पटाखों के धुएं में उड़े

पटाखे फोड़ने संबंधी जो प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट ने लगाए थे उनकी पालना नहीं होने से एक बार फिर यही सवाल पटाखों के धुएं के साथ हवा में उठते दिखाई दिए। पटाखों से होने वाले जानलेवा प्रदूषण के मद्देनजर इस बार सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किए थे कि पटाखे रात 8 से 10 बजे तक ही पटाखे चलाए जाएॅं। साथ ही ग्रीन पटाखे चलाए जाएॅं। यानी ऐसे पटाखे जिनमें बैरियम नाइट्रेट और एल्युमीनियम पाउडर का इस्तेमाल कम से कम हो, वही पटाखे जलाए जाएं। लेकिन हमने देखा कि दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की पालना में कोई मुस्तैदी दिखाई नहीं दी। भारत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

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प्राय: हम सुनते हैं कि भारत में कानून तो बहुत हैं पर उनकी पालना नहीं होती। भारत के लोग आदतन कानून का पालन नहीं करते या फिर भारत एक सॉफ्ट स्टेट है जहॉं कानून की पालना प्रति गंभीरता ही नहीं है। पटाखे फोड़ने संबंधी जो प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट ने लगाए थे उनकी पालना नहीं होने से एक बार फिर यही सवाल पटाखों के धुएं के साथ हवा में उठते दिखाई दिए। पटाखों से होने वाले जानलेवा प्रदूषण के मद्देनजर इस बार सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किए थे कि पटाखे रात 8 से 10 बजे तक ही पटाखे चलाए जाएॅं। साथ ही ग्रीन पटाखे चलाए जाएॅं। यानी ऐसे पटाखे जिनमें बैरियम नाइट्रेट और एल्युमीनियम पाउडर का इस्तेमाल कम से कम हो, वही पटाखे जलाए जाएं। लेकिन हमने देखा कि दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की पालना में कोई मुस्तैदी दिखाई नहीं दी। भारत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पॉलीथीन बैन से लेकर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर कानूनी निर्देश और हकीकत में बड़ा फासला नजर आता है। ऐसे में विधि के शासन को लेकर प्रशासन की मुस्तैदी और जनता के रवैये पर भी सवाल उठते हैं। तो क्यो नहीं हो पाती है भारत में कानूनों की अपेक्षित पालना — क्या कहते हैं इस बारे में जानकार — देखें हमारी विशेष रिपोर्ट :

नोटबंदी से क्या हासिल हुआ अब इस पर कई सिरों से सवाल उठने लगे हैं — लेकिन जो सवाल आज इस संदर्भ में उठता है वह है कि क्या सरकारी एजेंसियों के ऐसे फैसलों का हमें विरोध भी करना चाहिए या फिर सिर झुकाकर पालन ही करते रहना चाहिए। नोटबंदी की जिस तरह से और जितनी परेशानियों से पालना हुई उससे एक बात तो साफ है भारत के लोग हुकूमत का सम्मान करते हैं और उसके विरोध में नहीं जाते। अब सवाल यह उठाता है कि क्या हुकूमतें जो निर्णय लेती हैं वो सचमुच उनकी पालना भी चाहती हैं या फिर सिर्फ मंशा दिखाने, एक दूसरे पर दोषारोपण करने या वोट वटोरने के लिए कानून बना दिए जाते हैं और उनकी पालना की इच्छा तो हुकूमत की होती ही नहीं है।