रामायण हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी पढ़ते हैं। ऐसे में इसमें उल्लेखित खंजन पक्षी का नाम भी हमने सुना है। जिसके बारे में कहा जाता है कि कि उसके सिर से निकली शिखा को यदि कोई तोड़ कर रख ले तो वह गायब हो जाता है। यदि आप इस खंजन पक्षी को देखना चाहते हैं आपको आना होगा राजधानी जयपुर के पास टोंक रोड पर चंदलाई लेक और बरखेड़ा (CHandlai lake and barkheda ), जो इन दिनों कई दुर्लभ पक्षियों का आशियाना बना हुआ है। अब तक 294 प्रजातियों के पक्षियों के इस इलाके में आने की पुष्टि हुई है। इन पक्षियों में फ्लैमिंगो (Flamingo,) , ग्रे हैडेड लैपविंग (Gray Headed Lapwin), बार हैडेड गीज (Bar Headed Geese) , कॉमन शैलडक (Common Shellduck) , सफेद, काले और नारंगी रंग के रफ, कुरजा (Kurja),आइबिस (Ibis) , कॉमन पोचर्ड (Common Pochard) , रैड क्रेस्टेड पोचर्ड (Red Crested Pochar)और पेलिकन (Pelican) शामिल हैं। यहां इन प्रजातियों की पहचान की है वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर किशन मीणा (Wildlife Photographer Kishan Meena) ने। जो पिछले 15 साल से इनकी फोटोग्राफी कर रहे हैं।
पूरे साल रहता है पक्षियों का डेरा
तो पूरे साल ही इस इलाके में पक्षियों का डेरा रहता है पर खासतौर पर अगस्त से फरवरी तक 36 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों से गुलजार रहता है। बलूचिस्तान से ग्रे हैडेड भी इसी दौरान यहां आती हैं। उत्तर पूर्व से कॉमन पोचर्ड, रैड क्रेस्टेड पोचर्ड, पेलिकन और ग्रेट व्हाइट डालमेशियन भी यहां अपना डेरा जमाते हैं। वेरियेबल व्हीटीयर की तीन प्रकार की प्रजातियां भी यहां देखने को मिली हैं।
पक्षी अभयारण्य किया जाए घोषित
मीणा का कहना है कि चंदलाई क्षेत्र को पक्षी अभयारण्य घोषित किया जाना चाहिए जिससे यहां हो रहे अवैध निर्माण पर रोक लग सके। इसी तरह चंदलाई लेक में मछली के ठेके दिए जाने पर भी रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि इससे पक्षियों के भोजन का स्त्रोत समाप्त हो सकता है। साथ ही सीवेज के पानी को थोड़ा फिल्टर करने के बाद तालाब में छोड़ा जाए तो यह पक्षियों के साथ साथ पर्यावरण के हित में होगा।
2007 से कर रहे पक्षियों की पहचान
गौरतलब है कि चंदलाई लेक में जयपुर शहर का गंदा और सीवेज का पानी जाता है और गंदे पानी में पनपने वाले कीड़ेण्मकोड़े कई पक्षियों के भोजन का जरिया बनते हैं, जिसकी वजह से देश विदेश के पक्षी भारत में प्रवेश करने के बाद यहां भी आने लगे हैं। साथ ही आसपास की हरियाली भी पक्षियों के यहां आने का कारण बन रही है।
मीना ने बताया कि जब वे और उनके साथी यहां फोटोग्राफी कर रहे थे तो उन्होंने कुछ शिकारियों को पक्षियों का शिकार करते देखा। प्रकृति प्रेमी होने के नाते इससे उन्होंने काफी पीड़ा महसूस की। ग्रामीणों ने भी उन्हें पक्षियों के शिकार को रोकने की गुहार लगाई। इस पर कुछ पर्यावरण प्रेमी उनके समर्थन में खड़े हो गए। इसी का नतीजा है कि वर्ष 2007 की इस घटना के बाद चंदलाई लेक और बरखेड़ा आने वाले पक्षियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 2007 से ही पक्षी प्रेमी, फोटोग्राफी और अध्ययन के लिए यहां आने लगे। पक्षी प्रेमियों को घण्टों यहां पक्षियों को निहारते हुए देखा जा सकता है।