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Video: कैसे गायब हो रही है चीं-चीं करती चिड़िया

जयपुर . चीं-चीं करने वाली चिरैया या चिड़िया जैसे कई नामों ने जानी जाने वाली गौरेया अब कम होती नजर आ रही है।

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World Sparrow Day जयपुर . चीं-चीं करने वाली चिरैया या चिड़िया जैसे कई नामों ने जानी जाने वाली गौरेया अब कम होती नजर आ रही है।


गौरैया के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया दिवस (World Sparrow Day) मनाया है। इस दिवस को पहली बार वर्ष 2010 में मनाया गया था। लगातार घट रही गौरैया की संख्या को अगर गंभीरता से नहीं लिया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब गौरैया हमेशा के लिए दूर चली जाएगी। दुनियाभर मे गौरैया की 26 प्रजातियां हैं, जिसमें से 5 भारत में पाई जाती है। गौरैया की आबादी मे 50 से 60 फीसदी तक की कमी आई है। ब्रिटेन की ष्रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों से अनुसंधानकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को रेड लिस्ट में डाला है।


इसलिए कम हो रही गौरेया
: शहरीकरण के कारण वृक्षों की अंधाधुंध कटाई,अत्याधुनिक मकानों के साथ खेतों में पेस्टीसाइड के प्रयोग से गौरेया की संख्या कम हो रही है। घौंसला बनाने के लिए कोई स्थान न होने के कारण इनका बसेरा उजड़ सा गया है और इस कारण इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है।
: गौरैया ज्यादातर छोटे छोटे झाड़ीनुमा पेड़ों में रहती हैं लेकिन अब वो बचे ही नहीं हैं।
: आधुनिक स्थापत्य की बहुमंजिला इमारतों में गौरेया के रहने की जगह नहीं मिल पाती। सुपरमार्केेट संस्कृति के कारण अब पंसारी की दुकानें कम हुई हैं जिससे इनके लिए दाना नहीं मिल पाता।
: मोबाइल टावर से निकलने वाली तरंगों को भी हानिकारक माना जाता है। इनसे निकलने वाली तरंगे चिडि़या की दिशा खोजने की प्रणाली को प्रभावित करती है।
: गौरेया को घास के बीज पसंद होते हैं जो शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से मिलते हैं।
: गौरेया अधिक तापमान सहन नहीं कर पाती। प्रदूषण और विकिरण के कारण तापमान बढ़ रहा है।
: धार्मिक कारणों से कबूतर को अधिक महत्व दिया जाता है इसलिए चुग्गे वाली जगह कबूतर अधिक होते हैं क्योंकि गौरेया भोजन की तलाश में दूर निकल जाती है और अपना नया आशियाना बना लेती हैं।

 

गौरेया को बचाने की कवायद
राजस्थान एनिमल वेलफेयर बोर्ड के सदस्य और वल्र्ड संगठन के निदेशक मनीष सक्सेना गौरेया को बचाने की कवायद में लगे हैं। उनकी संस्था कृत्रिम घौंसले और परिंडे लगाकर इनके सरंक्षण के लिए पिछले कई सालों से प्रयासरत हैं। मनीष सक्सेना का कहना है कि जैव विविधता संतुलन में पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। शहरी क्षेत्रों में गौरैया की गिरती संख्या से संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। कृत्रिम घौंसले लगाकर इनके रहने तथा खाने के लिए दाना व पानी की व्यवस्था कर दोबारा से शहरी क्षेत्रों में बसाने की कवायद की जा रही है।