एम आई जाहिर / जोधपुर . देश को पहला नोबल पुरस्कार ( Noble Prize ) दिलवाने वाले अंग्रेजी व बांग्ला के विश्वप्रसिद्ध भारतीय साहित्यकार रविंद्रनाथ टैगोर ( RavindraNath Tagore ) के साहित्य के जोधपुर में भी कई कद्रदान हैं। यह शहर इस बात का समय-समय पर साक्ष्य देता रहा है। इस शहर ने उन्हें हर कला रूप में जुदा जुदा अंदाज में याद किया है।
साहित्यकारों, रंगकर्मियों, अकादमिकों और साहित्यप्रेमियों की गतिविधियां इस बात की मिसाल हैं। जोधपुर से MP व बाद में प्रवासी भारतीय मामलों के केंद्रीय मंत्री रहे स्व.लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ( Laxmimal Singhvi ) ने ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रहने के दौरान लंदन म्यूजियम से टैगोर रचनाओं की पांडुलिपियां भारत लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। इस पर पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व.ज्योति बसु के नेतृत्च में कोलकाता एयरपोर्ट पर भारी जनसमूह ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया था।
यूनिवर्सिटी के कोर्स में था गोरा
बरसों पहले रविंद्रनाथ टैगोर का उपन्यास गोरा जोधपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के भारतीय साहित्य के कोर्स में शामिल था, जो अब जयनारायण व्यास विवि के अंग्रेजी के कोर्स में नहीं है। यही नहीं, टैगोर लिखित.. द किंग ऑफ डार्क चैम्बर.. नाटक का मशहूर रंगकर्मी रतन थियाम ( Ratan Thiyam ) ने जोधपुर के टाउन हॉल में मंचन किया था।
नाटकों का मंचन
इसके अलावा टैगोर के नाटक मुक्तधारा को केंद्र में रख कर भानु भारती के निर्देशन में..और तमाशा न हुआ…नाटक का मंचन किया गया था। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर व पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के तत्वावधान में चार दिवसीय रविंद्र नाट्य समारोह का जोधपुर के टाउन हॉल में आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात और राजस्थान के नाटककारों- रंगकर्मियों ने टैगोर के नाटकों का मंचन किया था। इसमें लईक हुसैन निर्देशन में टैगोर के संपूण साहित्य पर और गुजरात के पी एस चारी के निर्देशन में डाक घर नाटक का मंचन किया गया था।
टैगोर पर सेमिनार व फिल्मोत्सव
गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के 150 वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में जोधपुर फिल्म सोसायटी और राजस्थान साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में 2012 में जोधपुर के चंद्रा इन सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजन किया गया था। उन पर 2013 में चार दिन के फिल्मोत्सव का आयोजन किया गया। सोसायटी के सचिव प्रो. मोहनस्वरूप माहेश्वरी और आयोजन सचिव प्रो.के एल श्रीवास्तव व डॉ.कौशलनाथ उपाध्याय ने उसमें भूमिका निभाई थी। उद्घाटन समारोह में अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्देशक कुमार शाहनी मुख्य अतिथि थे। वहीं मशहूर शाइर व आलोचक शीन काफ
निजाम, दिल्ली विश्वविद्यालय के तुलनात्मक साहित्य विभाग की प्रो.रिमली भट्टाचार्य और प्रख्यात राजस्थानी नाटककार और कवि डॉ. अर्जुनदेव चारण विशिष्ट अतिथि थे। अंग्रेजी लेखक डॉ. एस डी कपूर ने अध्यक्षता की थी। कार्यक्रम में हिन्दी साहित्यकार डॉ. हरिदास व्यास, अंग्रेजी नाटककार व प्रोफेसर रहे मदनमोहन माथुर, डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय व डॉ. छोटाराम ने पत्रवाचन किया था। गोष्ठी के बाद टैगोर की रचनाओं पर अंतरराष्ट्रीय निर्देशकों की बनाई पांच फिल्में टाउन हॉल आर्ट गैलरी में प्रदर्शित की गई थीं। इनमें सत्यजित रे की घरे बाहरे, तीन कन्या, तपन सिन्हा की क्षुघित पाषाण और कुमार शाहनी की चार अध्याय व हेमन गुप्ता की काबुलीवाला फिल्में प्रमुख थीं। कार्यक्रम के तहत 5 जनवरी को काबुलीवाला, 6 जनवरी को घर बाहरे, 11 जनवरी को कशमकश, 12 जनवरी को क्षुधित पाषाण व 13 जनवरी को चार अध्याय फिल्मों का प्रदर्शन किया गया था।
ललित कलाओं में कुछ अनूठे प्रयोग
इसके अलावा जोधपुर के मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट व इंग्लैण्ड की संस्था आउट ऑफ ककून की साझा मेजबानी में मेहरानगढ़ दुर्ग में इंग्लैण्ड के थिएटर डायरेक्टर यार्का हेलर ने टैगोर की बांग्ला कविता सिन्धु परे (सागर किनारे) पर आधारित एक अनूठे कलात्मक एक महीने के कार्यक्रम मिक्स मीडिया एग्जीबिशनका आयोजन किया था, जिसमें टैगोर की इस कविता को आधार बना कर चित्रकला, शिल्पकला और मूर्तिकला सहित सभी ललित कलाओं में कुछ अनूठे प्रयोग किए थे, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई थी। इसमें हिंदुस्तानी कलाकारों ने वीडियो इंस्टालेशन, सुंदर स्कल्पचर व पेंटिंग बना कर अपना टैगोर के प्रति अपने प्रेम का परिचय दिया था। यही नहीं , जयनारायण विवि के हिन्दी विभाग के प्रो. छोटाराम कुम्हार ने भी टैगोर पर शोध किया था। वहीं अंग्रेजी लेखक प्रो. एस डी कपूर को उनकी कृति गीतांजलि और इन्स्पायर फ्लाईज की पंक्तियां बखूबी याद हैं। बहरहाल जोधपुर का टैगोर प्रेम प्रशंसनीय है।
एक्सपर्ट कमेंट
टैगोर बहुत ग्रेट राइटर थे
मैं तो टैगोर का इतना प्रशंसक हूं कि अपने पोते को उनकी कविताएं याद करवाई हैं। टैगोर बहुत ग्रेट राइटर थे। उनके लेखन और व्यक्तित्व के कई रूप हैं। यह कोई जरूरी नहीं कि किसी राइटर को किसी यूनिवर्सिटी से रिकॉगनिशन मिले तभी वह महान हो। उन्होंने हाईस्कूल ड्रॉप किया था, लेकिन उनका ज्ञान अद्वितीय था और वे विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया था। वे पानी के जहाज में इंग्लैण्ड गए थे। महात्मा गांधी भी उन्हें बहुत मानते थे। टैगोर अपने नाटक जगह जगह ले कर गए थे। लोग उनसे कहते थे कि कहां जंगल में यूनिवर्सिटी बना रहे हो तो वे कहते थे कि मैं चाहता हूं कि लोग कुदरत के नजदीक रह कर विद्यार्जन करें, जहां प्रकृति का संगीत भी हो। एक बार फिल्म अभिनेता बलराज साहनी ने शांति निकेतन पहुंच कर नौकरी देने के लिए कहा। टैगोर ने उनसे पूछा कि आप हिन्दी में क्यों लिखते हो ? अपनी मातृ भाषा में क्यों नहीं लिखते? जो लोग मातृ भाषा में लिखते हैं,उनकी बात अलग ही होती है। टैगोर ने जलियांवाला बाग काण्ड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी। उन्होंने कहा था, जो देश इस तरह का कत्लेआम कर सकता है, मैं उसकी इन चीजों क ो लेने के लिए तैयार नहीं हूं।
-प्रोफे सर एस डी कपूर
पूर्व विभागाध्यक्ष व लेखक
अंग्रेजी विभाग
जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी
जोधपुर