अरविंद वर्मा
कानपुर देहात-हिन्दू मुस्लिम एकता की आज तक आपने तमाम मिसालें देखी और सुनी होंगी लेकिन आज हम आपको कौमी एकता की एक अनोखी मिसाल के बारे में दिखाएंगे और बताएंगे, जो अपने में अनोखी होने के साथ इकलौती भी है। हिन्दुओं की पूजा और मुस्लिमों की इबादत एक जगह जरुर देखी होगी, लेकिन सैयद बाबा और भगवान शिव का आपसी प्रेम नही देखा होगा। हम बात कर रहे कानपुर देहात के डेरापुर स्थित कपालेश्वर मंदिर की, जहां 1894 से भगवान शिव और सैयद एक साथ लोगों पर कृपा बरसा रहे है। डेरापुर के बियाबान जंगल में दो बाबाओं का सदियों से वास हो रहा है। यह मंदिर तहसील डेरापुर से महज 2 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां शिवलिंग के साथ सैय्यद बाबा की मजार बिलकुल अनोखी दिखाई देती है।
1894 से दो बाबाओं की मिसाल है कायम
आखिर शिवलिंग और सैय्यद बाबा के एक साथ होने की वजह जानने के लिए सन 1894 में इस मंदिर का निर्माण कराने वाले पंडित कनौजीलाल मिश्रा की चौथी और छठवी पीढ़ी से मुलाकात की, जिन्होंने हमें इस मंदिर के इतिहास के साथ इस मजार और शिवलिंग के रहस्य के बारे में बताया। उस वक्त फैजाबाद जिले के असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर तैनात हुआ करते थे। उन्होंने इस मंदिर का निर्माण सन 1894 में करवाया था। उन्होंने बताया कि उस समय जमीदारी प्रथा हुआ करती थी। एक दिन पंडित कनौजीलाल मिश्रा को सपने में दिखाई दिया कि उनके घर से कुछ दूरी पर जंगलो में भगवान् शिव का शिवलिंग है और उस पर चरवाहे खुरपी रेतने का काम कर रहे हैं, जिससे शिवलिंग से खून बह रहा है।
बस फिर कनौजीलाल मिश्रा ने कराई खुदाई
अगले ही दिन कनौजीलाल मिश्रा ने उस जंगल की और रुख किया और सपने में जो जगह दिखाई पड़ी थी। ठीक उसी जगह पर एक पत्थर है, जिससे खून निकल रहा है। इसके बाद कनौजीलाल मिश्रा ने वहां खुदाई कराई तो एक विशाल शिवलिंग दिखाई दिया, लेकिन जैसे जैसे खुदाई होती गयी तो शिवलिंग का स्वरूप देखकर लोग हैरान हो गए। दरअसल इस शिवलिंग के साथ एक मजार भी थी। जिसकी खुदाई कर लोग शिवलिंग और मजार का अंत देखना चाहते थे, लेकिन काफी खुदाई के बाद भी लोगो को इस प्रतिमा का दूसरा छोर नहीं मिला। जिसके बाद यहां बाबा कपालेश्वर का एक मंदिर बनवा दिया गया और लोग यहाँ पूजा पाठ करने लगे। जैसे जैसे मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोगो को यह पता चला कि यहाँ सैय्यद बाबा की मजार है, जो कि जमीन के भीतर से निकली है तो मुस्लिम धर्म के लोग भी यहां आये और इबादत का सिलसिला शुरू हो गया।
पीर पहलवान के नाम से भी जानते हैं लोग
लोगों का कहना है कि एक मंदिर के भीतर सैय्यद बाबा की मजार अपने में अनोखी है। जिस तरह भोले बाबा और सैय्यद बाबा का मिलन यहां सन 1894 में देखने को मिला। ठीक उसी तरह यहां हिन्दू और मुस्लिम धर्म के मानने वालों का सौहार्द भी तभी से देखने को मिल रहा है। दरअसल सावन माह में यहां भगवान शिव की पूजा में मुस्लिम शरीक होते है तो सैय्यद बाबा की मजार पर हिन्दुओं द्वारा चादर चढाने का भी चलन है। दोनों ही मजहबों को मानने वाले लोग यहां पूजा और ईबादत एक साथ करते है। एक दूसरे से न कोई भेदभाव और न ही आपस में कोई खटास है। इस इलाके में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय एक दूसरे के त्यौहारों में शरीक होते हैं। इस मंदिर में दोनों ही समुदायों के लोग बड़े ही सिद्दत से पूजा और इबादत दोनों ही करते है। कपालेश्वर मंदिर को लोग पीर-पहलवान के नाम से भी जानते हैं क्योंकि यहां सैय्यद बाबा को पीर और भगवान शिव को पहलवान के नाम से भी लोग मानते हैं। क्योंकि यहाँ शिवलिंग में सैय्यद और सैय्यद में शिवलिंग हैं। लिहाजा इस स्थान को पीर-पहलवान का भी दर्जा दिया गया है।