करौली. यूं तो पथरीले इलाके के बीच पेड़-पौधों को विकसित कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता, लेकिन जब इच्छाशक्ति प्रबल हो तो सबकुछ संभव है। ऐसा ही कुछ किया है करौली जिला मुख्यालय से करीब 13 किलोमीटर दूर आनन्दगढ़ गांव निवासी केदारसिंह राजपूत ने। जिन्होंने इच्छाशक्ति के साथ पर्यावरण संतुलन की खातिर करीब दो बीघा का बगीचा तैयार कर डाला।
यूं तो केदार सिंह बचपन से ही पर्यावरण प्रेमी रहे हैं, लेकिन ढलती उम्र के बाद भी पर्यावरण के प्रति उनका मोह कतई कमजोर नहीं पड़ा है। वर्तमान में 88 वर्ष की उम्र होने के बाद भी वे पेड़-पौधों की सार-संभाल में जुटे हैं। बगीचे में लहलहात पेड़-पौधों से छाई हरियाली को देख ग्रामीण भी खुश नजर आते हैं। उम्र अधिक होने के बावजूद केदार सिंह पेड-पौधों की सार-संभाल करते हैं, उनमें पानी डालते हैं। हालांकि वे अधिक काम नहीं कर पाते, लेकिन यह भी तय है कि एक बार बगीचे में जाकर जब तक कुछ नहीं कर लेते, उन्हें सुकून नहीं मिलता है।
केदार सिंह राजपूत बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें प्रकृति से प्रेम रहा। वे शुरू से ही खेती-बाड़ी से जुड़े रहे। इसी बीच करीब दो बीघा भूमि में पेड़-पौधे विकसित करने की सोची, लेकिन यह भूमि पथरीली होने से पहले उसमें कुछ मिट्टी डाली।
फिर धीरे-धीरे पौधे लगाए, लेकिन अनेक पौधे नष्ट हो गए, पर हिम्मत नहीं हारी और अपने मिशन में जुटे रहे। अन्तत: आज बगीचे में करीब 125 पेड़ लगे हैं, जो काफी बड़े हैं। इनके अलावा बगीचे में जामुन, मौसमी, अनार, अमरूद, भील, संतरा, नीबू, कनीजा, कनेट, मोगरा आदि के पेड-पौधे भी लहलहा रहे हैं।
उम्र भी नहीं बाधा
केदार सिंह के पुत्र भगवान सिंह के अनुसार उनके पिता की उम्र भले ही 88 वर्ष हो गई है, लेकिन आज भी वे पेड़-पौधों की सार-संभाल किए बिना नहीं रहते। हालांकि उम्र के हिसाब से अधिक काम नहीं कर पाते हैं।