कोटा . मुंहमांगी मुराद पूरी होने के तो तमाम किस्से सुने होंगे, लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां भगवान भक्तों के मन की सुनते हैं। मंदिर में भक्त के मन में जैसे ही कोई इच्छा जागृत होती है, भगवान से पूरी करने में क्षण भर की देर नहीं लगाते। हजारों साल से यह चमत्कार यहां रोज होता है। आइए आपको भी कराते हैं ऐसे पावन धाम के दर्शन।
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शकुंतला से भी इस शहर का गहरा रिश्ता
यूं तो कोटा की पहचान कोचिंग नगरी के तौर पर होती है लेकिन महर्षि विश्वामित्र और इंद्र की अप्सरा मेनका के मिलन से जन्मी पुत्री शकुंतला से भी इस शहर का गहरा रिश्ता रहा है। विश्वामित्र के अभिन्न मित्र और सप्तऋषियों में से एक महर्षि कण्व जिन्हें ऋषि कर्णव के नाम से भी जाना जाता है, ने शकुंतला का पालन.पोषण किया था। आर्याव्रत नरेश दुष्यंत से मिलन के बाद शकुंतला ने ऋषि कण्व के आश्रम में भरत को जन्म दिया, जो देश के प्रतापी राजा हुए। ऐसा कहा जाता है कि भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा।
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शिव का वरदान-भक्त को नहीं पड़ती मांगने की जरूरत
भगवान भोलेनाथ के परम भक्त महर्षि कण्व ने आर्याव्रत में चार आश्रमों की स्थापना की थी। जिसमें से एक कोटा के कंसुआ में स्थापित है। द्वन्होंने आश्रम में ही अपने आराध्य देव भगवान शिव और उनके परिवार के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा भी की।
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महर्षि कण्व की भक्ति से प्रसन्न भगवान भोलेनाथ ने उन्हें वरदान दिया कि अपने और जगत के कल्याण की इच्छा से आश्रम में आने वाले लोगों को कुछ भी मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी।