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मंदसौर

video देश की एकमात्र 10 वी शताब्दी की दुर्लभ शीतला से लेकर 12 वीं शताब्दी की ब्रह्मा के साथ ११ वीं शताब्दी की चामुंडा की यहां है प्रतिमा

देश की एकमात्र 10 वी शताब्दी की दुर्लभ शीतला से लेकर 12 वीं शताब्दी की ब्रह्मा के साथ ११ वीं शताब्दी की चामुंडा की यहां है प्रतिमा

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मंदसौर.
शहर में प्रवेश से ठीक पहले यशोधर्मन पुरातत्व संग्रहालय है। इसमें डेढ़ हजार साल तक की प्राचीन व दुर्लभ प्रतिमाएं है। इसमें अधिकांश शिवना के गर्भ से निकली तो गांव-गांव से ढुंढकर इन्हें यहां लाया गया। इतिहासकार केसी पांडेय ने इस संग्रहालय में तमाम मूर्तियों को लाने का काम प्रशासन के साथ मिलकर पिछले ४० सालों मे किया है। आज यहां १६४० मूर्तियां है। इस संग्रहालय में १२ वीं शताब्दी की ब्रह्मा की मूर्ति जो करीब ९०० साल पुरानी है। शिवना से दो टुकड़ों में मिली थी। जिसे यहां रखा। १० भुजा वाली मां शीतला की १० वीं शताब्दी की ११०० साल पुरानी देश की एकमात्र प्रतिमा जिसे कहा जाता है वह यहां है। इसमें शीतला मां गधे पर बैठी है और झाडू, सुपड़ा से लेकर धनुष हाथ में है। पार्वर्ती से का यह रुप है। चामुंडा की गजासुर वध वाली प्रतिमा भी यहंा है जो टुकड़ों में मिली थी जिसे बाद में जोड़ा गया। वहीं मेलकी गांव से चोरी हुई भगवान विष्णु व लक्ष्मी की गुरुणासन वाली प्रतिमा भी यहां है जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर यहां सुर्पदगी दी थी। शिवपुत्र कार्तिकेय की पत्नी कोमारी की दुर्लभ प्रतिमा भी संग्रहालय में है। मूर्ति आंक्राताओं के हमलों में टूटी मूर्तियां भी संग्रहित है तो किले की दीवार से निकली वेणुगोपाल की प्रतिमा इसमें शंख बजाते हुए दिख रहे है। जल के देवता वरुण की १० वीं शताब्दी की ११०० साल पुरानी मूर्ति यहां है।
लंबे जूते पहनने वाले एकमात्र देवता सूर्य की मूर्ति यहां बढ़ा रही शोभा
पांडेय ने बताया कि देवताओं में लंबे जूते पहनने वाले मात्र एक सूर्य देवता है उनकी भी यह लंबे जूते पहने यहां मूर्ति है। ७ घोड़े के रथ पर बैठे सूर्य देव वर्म पहने हुए है। तो वहीं शिवना से निकली विष्णु व शिव की भी कई दुर्लभ मूर्तियां यहां है। ११ वीं शताब्दी की शिव पाणिग्रहण जिसे कल्याणसुंदरम कहा जाता है उसे प्रतिमा के साथ ही अफजलुपर गांव से कुएं से निकली शिव की नटराज वाली मूर्ति है जिसके १९ टुकड़े हो गए थे ओर यहां सभी टुकड़ों को जोडक़र रखा गया।
जिले के एकमात्र पद्मश्री ने मंदसौर में रखी थी संग्रहालय की नींव
इतिहासकार केसी पांडेय ने बताया कि जिले से एक मात्र पद्मश्री डॉ वीएस वाकणकर थे। जिन्हें उनकी खोज व इतिहास व पुरातत्व के लिए किए कामों के कारण यह पुरुस्कार मिला था। उन्होंने वर्ष १९५४ में संग्रहालय बनाया था। फिर वर्ष १९८१-८२ में तत्कालीन कलेक्टर प्रहलादसिंह तोमर ने इसे आगे बढ़ाया और वर्ष १९८७-८८ में कलेकटर रहे मदनमोहन उपाध्याय ने इस काम को बढ़ाया और संग्रहालय को जगह मिली और भवन का काम शुरु हुआ। चार साल में यह बनकर वर्ष १९९२ में तैयार हुआ। मंदसौर के सम्राट रहे यशोधर्मन के नाम पर यह संग्रहालय तैयार हुआ और वर्ष १९९५ में इसका लोकार्पण हुआ। कई सालों के बाद खंडहरनुमा होते जा रहे इस संग्रहालय का कार्यालय पिछले साल तत्तकालीन कलेक्टर गौतमसिंह ने कराया और यहां रखी प्रतिमाओं के लिए स्टेंड भी बनाए ओर अभी काम चल रहा है।
७ अलग-अलग गेलरी में डेढ़ हजार साल तक प्राचीन प्रतिमाएं है
पांडेय ने बताया कि यशोधर्मन पुरातत्व संग्रहालय इसमें ७ अलग-अलग गेलरी है। इसमें एक शिव तो दूसरी विष्णु की मूर्तियों की गेलरी है। वहीं तीसरी सभी देवी प्रतिमाओं के अलावा बौद्ध, जैन धर्म से जुड़ी प्रतिमाओं के अलावा एक चित्र गेलरी है। तो एक स्टोरेज है वहीं अन्य देवताआं के अलावा प्राचीन तोरण द्वार से लेकर अन्य स्तंभो व चिंहों से जुड़ी गेलरी है। इसमें ५ वीं-६टी शताब्दी तक की करीब डेढ़ हजार साल पुरानी करीब
१६४० प्रतिमाएं है। शिवना नदी से निकली अधिकांश प्रतिमाएं यहां है। पांडेय व उनकी टीम ने इस संग्रहालय के लिए पिछले ४० सालों से काम किया और गांव-गांव घुमें और कही कुओं से तो कही नदियों से तो कही प्राचीन किलों की दीवारों से प्रतिमाएं मिले उन्हें यहां संग्रहित किया गया। अलग-अलग जगहों पर टुकड़ो में मिली दुर्लभ प्रतिमाओं को यहां लाकर जोड़ा। ९० मूर्तियां यहां शिवना से मिली हुई है।