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Nagaur patrika latest news…अधिकाधिक उत्पादन लेने होड़ में यूरिया का प्रयोग बढऩे से मिट्टी हो रही बीमार…VIDEO

नागौर. अधिकाधिक उत्पादन लेने की होड़ में यूरिया के बढ़ते प्रयोग से मिट्टी की प्रकृति भी बदलने लगी है। इसके अत्याधिक इस्तेमाल से हर साल मिट्टी की सेहत बिगड़ती चली जा रही है। खेती में यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल से साल दर साल मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है। इसके चलते जमीन में नाइट्रोजन, फास्फोरस, […]

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नागौर. अधिकाधिक उत्पादन लेने की होड़ में यूरिया के बढ़ते प्रयोग से मिट्टी की प्रकृति भी बदलने लगी है। इसके अत्याधिक इस्तेमाल से हर साल मिट्टी की सेहत बिगड़ती चली जा रही है। खेती में यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल से साल दर साल मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है। इसके चलते जमीन में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जिंक का संतुलन केवल बिगड़ रहा है, बल्कि अधिक यूरिया डालने से फसल पर हानिकारक कीड़े और बीमारियों का अधिक हमला होता है। वातावरण में जहर की मात्रा भी बढ़ती है। कृषि वैज्ञानिकों की माने तो फिर यूरिया के बढ़ते प्रयोग पर अंकुश लगाए जाने के लिए किसानों को जागरुक करने के साथ ही सरकार को भी कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से लगाम लगाए जाने के लिए प्रभावशाली कदम उठाने होंगे, अन्यथा स्थिति ज्यादा बिगड़ जाएगी।
जिले में यूरिया का प्रयोग प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2021-22 से मार्च 2024 तक औसतन 3800 मीट्रिक टन यूरिया का इस्तेमाल अकेले नागौर ग्रामीण क्षे्रत्र के खेतों में हुआ है, जबकि जिले में इसका आंकड़ा 28 हजार 600 मीट्रिक टन का रहा है। दिसंबर माह तक काश्तकारों की ओर से अभी भी 12 हजार 100 मीट्रिक टन की डिमांड है। इसमें और भी ज्यादा बढ़ोत्तरी होने की बात कृषि विभाग के अधिकारी कह रहे हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रति वर्ष औसत यूरिया का इस्तेमाल बढ़ता रहा है।

ब्लॉकवार तीन रबी सीजन में यूरिया इस्तेमाल की स्थिति
ब्लॉक खपत

नागौर 3800
खींवसर 5000
जायल 4500
मेड़ता 6500
डेगाना 4000
रियाबड़ी 4800

किसानों से कर रहे समझाईश
सहायक निदेशक कृषि विस्तार शंकरराम सियाक से बातचीत हुई तो बताया कि काश्तकारों को सीमित मात्रा में यूरिया प्रयोग की समझाइश की जा रही है। प्रयास किया जा रहा है कि काश्तकार जैविक खेती की ओर प्रोत्साहित हों। इसके लिए सरकारी स्तर पर संचालित योजनाओं के बारे में भी उनको बताया जा रहा है। इसके साथ ही उनको यह भी कहा जा रहा है कि वह राशायनिक यूरिया की जगह नैनो यूरिया का इस्तेमाल करें। ताकि खेतों की उर्वरा शक्ति अत्याधिक प्रभावित न हो सके।

केवल तीन माह में यूरिया की इतनी बढ़ी मांग
गत अक्टूबर से दिसंबर तक की मांग

ब्लॉक मांग
नागौर 3750
खींवसर 2020
जायल 1150
मेड़ता 3160
डेगाना 1320
रियाबड़ी 700

यूरिया के यह लाभ भी होते हैं
यूरिया एक नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक है जिसका इस्तेमाल फसलों में करने से कई फ़ायदे होते हैं। इसमें यूरिया से पौधों की वृद्धि, फसल की पैदावार में बढ़ोतरी, यूरिया से मिट्टी की उर्वरकता बढऩा, यूरिया से पौधों को नाइट्रोजन पोषक तत्व मिलना, यूरिया से पौधों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, क्लोरोफि़ल, एमिनो एसिड, और ऊर्जा यौगिक बनना, यूरिया से खाद्यान्न की प्रचुर उपलब्धता होना आदि सरीखे लाभ होते हैं।

क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक
यूरिया फसलों में डाले जाने के साथ ही यह पूरी तरह से घुल जाता है, और मिट्टी के अंदर जा रहा है। मिट्टी के अंदर पहुंचकर यह नाइट्रोसोमाइन तत्व पानी के साथ मिलने से बनता। इसकी वजह से भूजल में यह खतरनाक तत्व मिलकर पशुओं एवं मनुष्यों के शरीर में पहुंचकर कैंसर सरीखी घातक बीमारियों को पैदा कर रहा है। फसलों को बिगाड़ रहा है। यूरिया का अत्यधिक उपयोग आसानी से उर्वरक को नुकसान पहुंचा सकता है । यूरिया का इस्तेमाल हमेशा कुछ समय पहले ही कर लेना चाहिए क्योंकि इसका असर दिखने में काफी समय लगता है। यूरिया त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र में सूजन पैदा कर सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित रही है। यूरिया के प्रभावों की जांच के साथ ही इस संबंध में प्रभावशाली कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, नहीं तो फिर हालात और ज्यादा बिगड़ जाएंगे।
डॉ. गोपीचंद, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष कृषि विज्ञान केन्द्र अठियासन