
नागौर. ऊंट पालकों के लिए खुशखबरी है। अब शिशु ऊंट के जन्म होने पर उसके एक वर्ष पूर्ण होने तक की अवधि में 10 हजार नहीं, बल्कि पूरे 20 हजार की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि छह माह पूर्व बजट घोषणा में ऊंट पालन के संदर्भ में सरकार ने पिछले कई सालों से दी जा रही प्रोत्साहन राशि 10 हजार को 20 हजार करने की घोषणा की थी। आखिरकार बजट घोषणा के करीब छह माह के बाद सरकार ने इसकी प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति जारी कर दी है। इस आशय के आदेश पशुपालन विभाग के शासन उपसचिव संतोष करोल ने मंगलवार को जारी कर दिए। इससे ऊंट पालकों ने राहत की सांस ली है।
अब बढ़ेगा राज्य में ऊंटों का कुनबा
प्रदेश ही नहीं, देश में भी ऊंटों की संख्या तेजी से आने लगी थी। स्थिति यह रही कि सरकारी नीतियों के चलते पहले से ही जहां प्रदेश में वर्ष 2012 की पशु गणना में राज्य में 3 लाख 25 हजार 713 ऊंट थे। वहीं 20 वीं पशु गणना में 2 लाख 12 हजार 739 ऊंटों की संख्या ही रह गई। प्रदेश में एक लाख 12 हजार 974 ऊंटों की संख्या घट गई थी। इसका कारण बताते हैं कि पूर्व में ऊंट पालन के लिए मिल रही प्रोत्साहन राशि महज 10 हजार की राशि अपर्याप्त सिद्ध हो रही थी। इससे डेढ़ से दोगुना ज्यादा ऊंट पालकों का शिशु ऊंट के जन्म होने के साथ ही एक वर्ष के पालन तक में ही व्यय हो जाता था। ऐसे में इसको लेकर प्रदेश के विभिन्न जिलों से ऊंट पालकों की ओर से प्रोत्साहन राशि को बढ़ाए जाने का अनुरोध किया जा रहा था। अब सरकार की ओर से शिशु ऊंट के जन्म होने पर प्रोत्साहन राशि दोगुनी होने से उम्मीद की जा रही है कि ऊंटों के कुनबों में इजाफा होगा।
फिर भी नहीं बढ़े ऊंट
हालांकि ऊंटों की घटती संख्या से चिंतित पूर्ववर्ती सरकार ने वर्ष 2014 में ऊँट को राज्य पशु का दर्जा दिए जाने के साथ ही ऊंटों के संरक्षण के लिए योजना भी चलाई, लेकिन इसमें तमाम विसंगतियों की वजह से यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाई। ऊंट पालन से जुड़े पालकों का मानना है कि इसके पीछे अन्य भी कारण हैं। इसमें चारागाहों की कमी, ऊंटों में प्रजनन की कमी, युवा वर्ग का ऊंट पालन में रुचि नहीं ले रहा है, ऊंटों का संरक्षण होने के बजाए उन्हे नुकसान ज्यादा हुआ है। इसका कारण यह है कि पहले ऊंट के बीमार होने या बूढ़ा होने पर उसे बचेना आसान था। उसे राज्य से बाहर भी भेजा जा सकता था। ऊंट का चमडा अच्छी कीमत देता था। अब यह सब संभव नहीं है। ऐसे में ऊंट बूढ़ा या बीमार हो जाता है वह ऊंटपालक के लिए बड़ा बोझ बन जाता है। यह कारण है कि ऊंटपालक अब ऊंटों के प्रजनन में ज्यादा रुचि नहीं लेते है।
ऊंटों की यह होती हैं प्रजातियां
राजस्थान में कई नस्लों के ऊंट पाए जाते हैं। इनमें से मुख्य नाचना और गोमठ ऊंट हैं। नाचना नस्ल के ऊंट सवारी या तेज दौडऩे वाले होते हैं, जबकि गोमठ ऊंट कृषि संबंधी या भारवाहक के रूप में काम में लिया जाता है। इसके अलावा अलवरी, बाड़मेरी, बीकानेरी, कच्छी, सिंधु, मेवाड़ी और जैसलमेरी ऊंट की नस्लें भी राजस्थान में मिलते हैं।
साढ़े आठ लाख ऊंट खत्म
वर्ष 1977 से वर्ष 2019 तक के आंकड़ों का आकलन करने पर पता चलता है कि करीब साढ़े आठ लाख ऊंट देश में कम हो गए हैं। यानि ऊंट घटने का प्रतिवर्ष का औसत 50 प्रतिशत से ज्यादा है। यह स्थिति तब है, जबकि ऊंट किसी बड़ी महामारी के शिकार नहीं हुए हैं। जानकारों के अनुसार आंध्रप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र व केरला में गिनती भर के ऊंट हैं।
इस तरह से घटता गया ऊंटों का कारवा
वर्तमान में देश में ऊंटों की संख्या कुल 2 लाख 51 हजार 956 रह गई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1977 में 11 लाख, 1982 में 10 लाख 80 हजार, 1987 में 10 लाख, 1992 में 10 लाख 30 हजार, 1997 में 9 लाख 10 हजार, 2003 में 6 लाख 30 हजार, 2007 में 5 लाख 20 हजार, 2012 में चार लाख, 2019 में की 2 लाख 50 हजार रह गए हैं।
इनका कहना है…
ऊंट पालन प्रोत्साहन राशि अब दस हजार से बढ़ाकर 20 हजार कर दी गई है। शिशु ऊंट के जन्म से लेकर एक वर्ष तक पूर्ण होने पर कुल 20 की राशि दो किस्तों में देय रहेगी। यह योजना प्रदेश में लागू की जा चुकी है।
डॉ. भवानी सिंह, निदेशक, पशुपालन निदेशालय जयपुर