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Nagaur patrika…सतगुरु का मार्गदर्शन अनंत भावों से मुक्ति दिलाने का कार्य करता है…VIDEO
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Nagaur patrika…सतगुरु का मार्गदर्शन अनंत भावों से मुक्ति दिलाने का कार्य करता है…VIDEO

नागौर

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Sharad Shukla

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Updated: 9 Sep 2025, 10:14 PM IST

नागौर. जयमल जैन पौषधशाला में चातुर्मास में चल रहे प्रवचन में जैन समणी सुयशनिधि ने कहा कि सतगुरु का मिलना दुर्लभ होता है। सतगुरु मिल गए तो फिर जीवन की सबसे बड़ी निधि मिल गई। सतगुरु आसानी से नहीं मिलते हैं। इसके लिए भी परिश्रम करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि माता, पिता एवं भाई तो पारिवारिक जीवन में सहयोग करते हैं, लेकिन सतगुरु तो हमें हमारे जीवन का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि सतगुरु केवल मार्ग ही नहीं दिखाते हैं, बल्कि उस मार्ग पर ले जाने के लिए वह भी शिष्यों के साथ अथक मेहनत करते हैं। जिससे कि लक्ष्य प्राप्त हो सके। यह सभी इतना सहज नहीं होता है। इसके लिए भी तप करना पड़ता है। सतगुरु हमें सही मार्ग दिखाते हुए आत्मा के उत्थान की राह खोलते हैं। यह सांसारिक संबंध तो केवल इस जीवन तक सीमित हैं, लेकिन सतगुरु का मार्गदर्शन तो हमें अनंत भवों के बंधन से मुक्ति दिलाने वाला होता है। गोशालक और महावीर स्वामी का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए समझाया कि गुरु को छोडऩे वाले शिष्य का जीवन संकटों से युक्त हो जाता है। फिर वह आत्मोत्थान के मार्ग पर नहीं बढ़ सकता है। इस मार्ग पर आगे बढऩा है तो सतगुरु के प्रत्येक निर्देश को आस्था भाव के साथ ही स्वीकारना होगा। अन्यथा, फिर आप कभी भी इस मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि गोशालक ने महावीर स्वामी का साथ छोडकऱ स्वतंत्र साधना का मार्ग चुना,किंतु इसका परिणाम क्या रहा। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि गोशालक ने महावीर स्वामी का का साथ छोड़ा और स्वतंत्र साधना का मार्ग तो चुना, मगर उसका अंत दु:ख और पराजय के साथ हुआ। अंतत: उसे यह स्वीकारना पड़ा कि सतगुरु का मार्ग ही वास्तविक कल्याणकारी मार्ग है। यह उद्धरण श्रद्धालुओं के लिए एक प्रेरणा है। यह उद्धरण बताता है कि आपके जीवन में सतगुरु का कितना महत्व होता है। उनके बिना यानि की सतगुरु के बिना आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि सतगुरु का सान्निध्य साधक को संयम, धैर्य और विवेक प्रदान करता है। जब मनुष्य जीवन की कठिनाइयों में डगमगाता है तो उसकी पतवार को सतगुरु थाम लेते हैं, और उसे स्थिरता के साथ सही दिशा देने का कार्य करते हैं। गुरु का आशीर्वाद केवल आशीर्वाद नहीं होता है, बल्कि यह वरदान होता है। इस वरदान को प्राप्त करने की पात्रता भी होनी जरूरी है, अन्यथा सतगुरु तो प्रयास करते हैं, लेकिन शिष्य में यदि समुचित पात्रता नहीं है तो फिर उसे उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता है। कहने का अर्थ यह है कि सतगुरु ही जीवन के अंधकार को दूर कर ज्ञान और शांति का प्रकाश फैलाने का महती कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि धन, वैभव और प्रतिष्ठा सब नश्वर हैं, किंतु यदि सतगुरु मिल जाए तो जीवन को वास्तविक अर्थ और मोक्ष की दिशा मिल जाती है।
यह हुए सम्मानित
संघ मंत्री हरकचंद ललवाणी ने बताया कि प्रवचन में पूछे गए प्रश्नो के उत्तर देने वालों में अंकित ललवाणी व रेखा सुराणा को रजत मेडल से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में अतिथि सत्कार का लाभ महावीरचंद भूरट परिवार को मिला। इसमें किशोर चंद ललवाणी, प्रकाशचंद बोहरा, मूलचंद ललवाणी, भीकमचंद ललवाणी, नरपतचंद ललवाणी आदि मौज्ूाद थे।