नागौर. जयमल जैन पौषधशाला में चातुर्मास में चल रहे प्रवचन में जैन समणी सुयशनिधि ने कहा कि कि भगवान महावीर स्वामी का जीवन क्षमा, सहनशीलता और तप का अद्वितीय उदाहरण है। शूलपाणि यक्ष के प्रबल उपसर्ग में भी प्रभु अडिग रहे। अंतत: यक्ष उनकी करुणा और धैर्य के आगे नतमस्तक हो गया। उन्होंने कहा कि दुख का दूत अचानक जीवन में आकर नहीं धमकाता, उससे पहले उसके संकेत और लक्षण दिखाई देते हैं। यदि हम उन्हें पहचान लें और पाप से दूर रहें, तो दुख से मुक्ति संभव है। पाप ही दुख का मूल कारण है, और उसका नाश होते ही सुख और शांति का मार्ग खुल जाता है। जैन समणी सुगमनिधि जी ने तीन प्रकार के जागरण बताते हुए कहा कि धर्म जागरण, अधर्म जागरण और सुदर्शन जागरण। धर्म जागरण का अर्थ है आत्मा के भीतर सुप्त पड़े हुए सदगुणों को जगाना। इसमें जीव मोह-निद्रा से जागकर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की ओर अग्रसर होता है। अधर्म जागरण वह है, जिसमें जीव पाप प्रवृत्तियों को जगाता है और क्रोध, मान, माया तथा लोभ जैसी कषायों को पोषित करता है।तीसरा है सुदर्शन जागरण, जिसमें साधक आत्मा को सम्यक रूप से जानता है और सम्यक दृष्टि से जागरण करता है। सुदर्शन जागरण ही धर्म जागरण की सीढ़ी है। संघमंत्री हरकचंद ललवाणी ने बताया कि प्रवचन के दौरान पूछे गए प्रश्नों के उत्तर प्रदीप बोहरा और अवनी ललवाणी ने दिए।इन्हें रजत मेडल द्वारा सम्मानित किया गया। प्रवचन प्रभावना का लाभ सुशील कुमार प्रवीण कुमार चौरडिया परिवार को मिला। आज 21 जनों ने उपवास के प्रत्याख्यान लिए। संचालन संजय पींचा ने किया। इस दौरान नरेन्द्र चौरडिया, किशोरचंद ललवाणी, नरपत ललवाणी, किशोरचंद पारख, धनराज सुराणा, मूलचंद ललवाणी, अशोक नाहटा आदि उपस्थित थे।