नागौर. शांतिकुंंज हरिद्वार के प्रतिनिधि एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्डया गुरुवार को नागौर पहुंचे। यहां पहुंचने पर डॉ. पण्ड्या का गायत्री परिवार की ओर से स्वागत किया गया। कार्यक्रम में पहुंचे डॉ. चिन्मय पण्डया ने औपचारिकता छोड़ तुरन्त माईक संभाल लिया, और कहा कि वह नागौर-वासियों से ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हैं कि वह ज्यादा समय नहीं दे पाएंगे, उनको बेहद ही आवश्यक कार्यवश जाना भी है। फिलहाल वह नागौर आकर अभिभूत हैं। इस बार वायदा करते हैं कि अगली बार आएंगे तो वह नागौर-वासियों से बातचीत भी करेंगे।
कार्यक्रम में संबोधित करते हुए डॉ. चिन्मय ने कहा कि युवा शक्ति अपनी ऊर्जा को पहचानकर कार्य करे। युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रिसर्च करना चाहिए। ताकि नवीन तथ्य जानकारियां लोगों के सामने आ सके। उन्होंने गुरुदेव के सूत्र जाति, वंश सब एक समान, एक पिता की सब संतान को जीवन में उतारने का आह्वान करते हुए कहा कि वह शिक्षा के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर नवीन खोजें कर देश को नित नई ऊंचाइयां प्रदान करने का कार्य करें। सनानत संस्कृति की विशेषता को समझाते हुए कि इसके रंग में रंगकर युवा देश को एक बेहतर स्वरूप देने का काम करें तो बेहतर रहेगा। उन्होंने कहा कि वह कई जगहों पर गए हैं, और युवाओं से सीधा संवाद भी किया है। यह पूरी तरह से साफ है कि युवाओं में ऊर्जा तो अपार है, लेकिन इस ऊर्जा का उनको सदुपयोग करना चाहिए। डॉ. पण्ड्या ने नारी शक्ति से अपनी गरिमा बनाए रखते हुए कंधे से कंधा मिलाकर काम करने आह्वान किया। डॉ. पण्ड्या व इनके साथ आए राजस्थान विभाग प्रभारी ओमप्रकाश, टी. आर. शर्मा, सहप्रभारी राजस्थान जोन प्रशांत भारद्वाज का नागौर गायत्री परिवार के प्रमुख भोजराज सारस्वत, रामेश्वर सारस्वत, डॉ. श्रीराम शर्मा,बालकिशन कांकड़ा एवं राजेन्द्र प्रजापत ने स्वागत किया।
सनातन संस्कृति महान है: साक्षात्कार
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. पण्ड्या से बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति न केवल महान है, बल्कि इसमें सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक विशेषताएं भी हैं। इसकी विशेषताएं समझने वाला सनातन संस्कृति के रंग में खुद-ब-खुद रंग जाता है।
प्रश्न: वर्तमान में कॉन्वेंटेड युग में गायत्री परिवार अपने आपको कहां पाता है…?
उत्तर: गुरुदेव ने यह मिशन शुरू किया था। इसके बाद से गायत्री परिवार देश ही नहीं, विदेशों में भी फैल गया है। इसकी शाखाएं अनंत हैं।
प्रश्न: वर्तमान शिक्षण शैली में युवा एवं बच्चे सनातन संस्कृति से दूर जा रहे हैं…?
उत्तर: ऐसा नहीं है, सनातन संस्कृति विशेष है। बच्चे एवं युवा सभी इसके साथ जुड़े हुए हैं। सनातन की विशेषता है कि वह अपने से जुडऩे वाले को परिपूर्ण कर देता है।
प्रश्न: आज के समय में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव युवाओं एवं बच्चों में ज्यादा है…?
उत्तर: वातावरण का विशेष प्रभाव जरूर पड़ता है। इसलिए घरों में भी बच्चे जो देखते हैं, वहीं अपना लेते हैं। इसका ध्यान तो हमें रखना पड़ेगा, लेकिन सनातन संस्कृति अपनी परिपूर्णता के साथ सभी को सहजता से अपना रही है। आज
प्रश्न: युवाओं के लिए कोई संदेश…?
उत्तर: युवा अपनी संस्कृति के साथ ही अपनी ऊर्जा को पहचानें।