मध्यप्रदेश के कटनी का बहुचर्चित अर्चना तिवारी मिसिंग केस अब रहस्य नहीं रहा। 13 दिन तक पुलिस की नाक में दम करने वाली अर्चना आखिरकार नेपाल के काठमांडू से बरामद कर ली गई। मगर, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि 13 दिन तक पुलिस की नाक में दम करने वाली अर्चना पर पुलिस एफआईआर भी दर्ज नहीं होगी। इसके पीछे कानूनी पेचिदगियां है। जीआरपी पुलिस अधीक्षक राहुल लोढ़ा ने खुद इसकी जानकारी दी। एसपी राहुल लोढ़ा के मुताबिक, लड़की अपनी मर्जी से घर से गई थी, ऐसे में उस पर आपराधिक केस नहीं बनता। लेकिन सवाल ये भी है—क्या सरकारी मशीनरी को 13 दिन तक उलझाए रखना अपराध नहीं? आपको बता दें, इस केस को सुलझाने में करीब 70 पुलिसकर्मियों की फौज दिन-रात जुटी रही। जिसमें जीआरपी, एसडीआरएफ, अन्य पुलिस टीमें और साइबर एक्सपर्ट शामिल थे। दो हजार से अधिक CCTV फुटेज खंगाले गए। नदियों, पहाड़ों और जंगलों में तलाशी अभियान चला। ड्रोन, स्निफर डॉग्स और गोताखोर तक लगाए गए। पुलिस ने तलाश में 6 शहर और 2 देशों की खाक छानी। अब सवाल ये कि इन सब पर आया खर्च कौन देगा? क्या मनमर्जी सरकारी मशीनरी पर भारी नहीं पड़ी।
मिसिंग केस में सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि अर्चना ने ही खुद के अपहरण की प्लानिंग की थी। एसपी लोढ़ा के मुताबिक वकील और सिविल जज एस्पिरेंट अर्चना तिवारी का एमपी के ही शुजालपुर में रहने वाले सारांश जैन नाम के लड़के से दोस्ती थी। सारांश इंदौर की एक कंपनी मे काम करता था। दोनों की मुलाकात 1 जनवरी को ट्रेन में हुई थी, जिसके बाद से दोनों के बीच बातचीत होने लगी। अर्चना तिवारी के लिए लगातार शादी के रिश्ते आ रहे थे, लेकिन वो शादी नहीं करना चाहती थी। अर्चना के घर वालों ने पटवारी से उसका रिश्ता तय कर दिया और पढ़ाई छोड़कर शादी करने का दबाव बना रहे थे। यही वजह है कि अर्चना ने सारांश के साथ ही नेपाल जाने की योजना बनाई थी।
आपको बता दें, मध्य प्रदेश के कटनी जिले की रहने वाली अर्चना तिवारी 7 अगस्त को नर्मदा एक्सप्रेस ट्रेन के कोच B-3, बर्थ नंबर 3) से इंदौर से कटनी के लिए रवाना हुई थी… लेकिन कटनी पहुंचने से पहले ही वो रहस्यमयी ढंग से लापता हो गई. उसके भाई अंकुश तिवारी ने 8 अगस्त को कटनी GRP थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज की.. इसके 13 दिन बाद पुलिस ने उसे नेपाल के काठमांडू से पकड़ लिया था। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पुलिस ने उसे परिजनों को सौंप दिया। अब जब अर्चना घर लौट आई है तो पुलिस और समाज दोनों के सामने सवाल यही है कि निजी फैसले के नाम पर की गई मनमर्जी सरकारी मशीनरी और समाज पर कितना बोझ बन रही है?