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भजनों में ऐसी डूबीं कि आंखों से छलक आए आंसू

कुंजवन स्थित शीतलामाता मंदिर परिसर में लगातार दूसरे दिन भी पूरे दिन चला महानाम संकीर्तन

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पन्ना. शीतला माता मंदिर परिसर में चल रहे ४८ घंटों के अखंड महानाम संकीर्तन में दोपहर को भजन गायक मंडली की महिलाएं भजनों में भाव-विभोर होकर ऐसी डूबीं की उनका गला रुंधने लगा और आंखों से आंसू की धार बह निकली। भजन सुन रहीं बंगाली समाज की बुजुर्ग महिलाओं ने उन्हें भेंटकर गले लगाया और सम्हाला। यहां ऐसे लम्हे हर दो-चार घंटों के बाद देखने को मिल जाते हैं। गायक मंडली के लोग रहे रामा-हरे कृष्णा भजन की धुन में ऐसे डूबते हैं कि उन्हें और किसी का होश ही नहीं रह जाता है।


महानाम कीर्तन स्थल का माहौल देखते ही बनता था। सैकड़ों की संख्या में बैठे बंगाली समाज के लोग महानाम कीर्तन में पूरी तरह से डूबे हुए थे। आयोजन स्थल पर ही अनवरत भंडारा तो चल ही रहा था साथ ही यहां आने वालों के लिए चाय-नाश्ते आदि की भी व्यवस्था की गई थी। मोबाइल ट्यलेट और जूता-चप्पल बैंक भी बनाया गया था। जिससे लोग बिना हेडक के धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हो सकें।
कुंजवन स्थित शीतला माता मंदिर में बंग्ला नव वर्ष (१५ अप्रेल) के पहले मंगलवार पर १८ अप्रेल को शीतला माता की पूजा-अर्चना की गई और इसके दूसरे दिन १९ अप्रेल की रात को ४८ घंटे के महानाम संकीर्तन के लिए कलश की स्थापना हुई थी। २० अप्रेल की सुबह ४ बजे से महानाम संकीर्तन शुरू हुआ जो दूसरे दिन शुक्रवार को भी पूरा दिन चलता रहा। यह पूरा रात भी चला। समापन २२ अप्रेल की सुबह ४ बजे होगा। इसके बाद शाम को महाआरती के बाद खिचड़ी का प्रसाद बांटा जाएगा।
बंटेगा छह क्विंटल से अधिक खिचड़ी का प्रसाद
$कुंजवन के पूर्व सरपंच प्रताप विश्वास ने बताया, खिचड़ी का प्रसाद बांटने के लिए तीन क्विंटल से भी अधिक का तो चावल ही लगता है। इसके अलावा करीब १५० किलो दाल और करीब इतनी ही सब्जी का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा ५० लीटर तेल व देसी घी, ८ से १० हजार रुपए कीमत के मसाले लग जाते हैं। इस प्रकार से छह क्विंटल से अधिक के खिचड़ी का प्रसाद बनाया जाएगा। यह प्रसाद पाने के लिए इतनी अधिक संख्या में लोग पहुंचते हैं कि उस दौरान पूरे मार्ग में घंटों तक जाम के हालात रहते हैं। बंगाली समाज के ही पंकज किर्तनिया ने बताया कि वे यहां आने वाले श्रद्धालुओं के जूते-चप्पलों के हिफाजत का काम करते हैं। सभी को एक टोकन दिया जाता है तो दिखाने पर उन्हें उनके जूते-चप्पल वापस मिल जाते हैं।

कुश मल्लिक ने बताया, यहां कई समितियां बनी हुई हैं। भोजन व्यवस्था, कीर्तन की व्यवस्था, बाहर से आने वालों के व्यवस्था के लिए अलग-अलग समितियां बनी हैं। अभी अपना-अपना काम कर रहे हैं। बंगाली समाज के ही अन्य लोगों ने बताया, शाम को पूरे इतनी अधिक संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं कि पूरे मंदिर परिसर में जगह ही नहीं बचती है।