सवाईमाधोपुर. रणथम्भौर दुर्ग में पुरातत्व विभाग की उदासीनता त्रिनेत्र गणेश के दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को भारी पड़ सकती है। दरअसल रणथम्भौर बाघ परियोजना के बीचों बीच स्थित रणथम्भौर दुर्ग की सुरक्षा दीवार कई जगहों से क्षतिग्रस्त हो रही है। ऐसे में क्षतिग्रस्त दीवार में बनी जगह में रणथम्भौर बाघ परियोजना में विचरण करने वाले बाघ-बाघिन आसानी से जंगल से निकलकर रणथम्भौर दुर्ग तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में त्रिनेत्र गणेश के दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी खतरे का अंदेशा बना हुआ है।
झालरा वन क्षेत्र में भी टूटी हुई है दुर्ग की दीवार
रणथम्भौर के नॉन पर्यटन क्षेत्र झालरा में भी रणथम्भौर दुर्ग की दीवार क्षतिग्रस्त हो रही है। दीवार के क्षतिग्रस्त होने के कारण उक्त स्थान पर इतनी जगह हो गई है कि कोई भी बाघ-बाघिन या अन्य कोई भी वन्यजीव उक्त स्थान से आसानी से जंगल से निकलकर दुर्ग तक आ जा सकता है। गौरतलब है कि बाघिन एरोहैड यानि टी-84 का मूवमेंट भी अधिकतर इसी वन क्षेत्र में रहता है और बाघिन भी गत दिनों करीब चार-पांच दिनों तक रणथम्भौर दुर्ग पर ही विचरण करती पाई गई थी। ऐसे में बाघिन एरोहैड के भी इसी प्रकार क्षतिग्रसत दीवार के कारण हुई जगह मेंसे ही दुर्ग तक जाने की आशंका जताई जा रही है।
पुरातत्व विभाग के अधीन है किला
रणथम्भौर का जंगल भले ही वन विभाग के अधीन हो लेकिन रणथम्भौर दुर्ग अभी भी पुरातत्व विभाग के ही अधीन है। ऐसे में रणथम्भौर दुर्ग की दीवारों व अन्य मरम्मत कराने का कार्य भी पुरातत्व विभाग की ही जिम्मेदारी है। हालांकि पुरातत्व विभाग की ओर से कई स्थानों पर दुर्ग में मरम्मत कार्य कराया भी जा रहा है लेकिन अभी भी पुरातत्व विभाग की ओर से वन क्षेत्र की ओर से क्षतिग्रस्त दुर्ग की दीवारों की मरम्मत कराने की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
वन विभाग ने लिखा पुरात्व विभाग को पत्र
रणथम्भौर दुर्ग पर कई दिनों तक बाघ-बाघिन का मूवमेंट बना रहने के कारण गत दिनों वन विभाग ेकी ओर से पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को पत्र लिखकर रणथम्भौर दुर्ग के सूरजपोल क्षेत्र मेंं क्षतिग्रसत सुरक्षा दीवार की मरम्मत कराने की मांग भी की गई थी हालांकि इसके बाद भी अब तक पुरात्त्व विभाग की ओर से क्षतिग्रस्त दीवारों की सुध नहीं ली जा रही है।
झालरा वन क्षेत्र में है बाघिन का मूवमेंट
हालांकि वर्तमान में रणथम्भौर दुर्ग पर किसी भी बाघ-बाघिन का मूवमेंट नहीं है। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बाघिन एरोहैड का मूवमेंट जहां वर्तमान में झालरा वन क्षेत्र में हैं वहीं बाघ टी-120 का मूवमेंट भी रणथम्भौर के जोन तीन व चार में बना हुआ है।
इनका कहना है…
वर्तमान में दुर्ग पर किसी बाघ-बाघिन का मूवमेंट नहीं हैं। बाघ-बाघिन वापस जंगल में लौट गए हैं। जहां तक दुर्ग की दीवारों के क्षतिग्रसत होने का सवाल है तो रणथम्भौर दुर्ग पुरातत्व विभाग के अधीन है। ऐसे में दुर्ग की दीवारों की मरम्मत की जिम्मेदारी भी पुरातत्व विभाग की ही है। इस संबंध में हमारी ओर सं पुरतत्व विभाग को अवगत भी कराया गया है।
– महेश शर्मा, क्षेत्रीय वनाधिकारी,आरओपीटी, रणथम्भौर बाघ परियोजना।