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सवाई माधोपुर
आज भी जहन में जिंदा है होली की पुरानी परम्पराएं
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आज भी जहन में जिंदा है होली की पुरानी परम्पराएं

अतीत के झरोखे से होली के रंग.. समय के साथ बदला अंदाज

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सवाईमाधोपुर. होली का पर्व नजदीक है। हर कोई होली की तैयारियों में जुट गया है। वहीं यदि होली के तौर तरीकों की बात करें तो समय के साथ होली मनाने और खेलने के तौर तरीकों में काफी बदलाव आया है वहीं कुछ बाते ऐसी भी है जो समय बदलने के बाद भी आज तक लगातार जारी है। पेश है एक रिपोट…र्
देवर-भाभी की कोड़ामार होली
आज भी घरों में देवर भाभी के बीच होली पर मनोरंजन का चलन है, लेकिन अब इसके तरीकों में कई परिवर्तन आए हैं। पुराने समय का तो रोमांच ही निराला था। भाभियां कपड़े का जो कोड़ा बनाती थीं। उनके एक सिरे पर एक छोटा सा पत्थर बांध दिया जाता था। पानी में भीगा कोड़ा जब सनसनाता हुआ होली खेलने वालों की पीठ पर पड़ता तो वह कई दिनों तक भूल नहीं पाता था।
सड़कों पर सिक्के
होली के त्योहार पर यह एक मनोरंजन का साधन हुआ करता था। बाजारों में पत्थर के चौके की सड़कों पर कुछ दुकानदार सिक्के जमीन में कील की सहायता से चिपका देते थे और राह चलता कोई व्यक्ति भ्रमित होकर उसे उठाने की कोशिश करता था तो वे उसका मजाक उड़ाते थे। कुछ लड़के सूतली के सहारे से तार का एक आंकड़ा लटका देते थे और राहगीर की टोपी या कंधे पर गमछे में उस आंकड़े को फंसा देता था। दूसरा लड़का उसे खींच लेता था। विस्मित होकर वह राहगीर ताकता रह जाता।
आज भी की जाती है होली के डांडे की सुरक्षा
इतिहासकार प्रभाशंकर उपाध्याय ने बताया कि करौली में परीता नाम का गांव है। दूसरे गांव के लोग होली का डांडा उखाड़ ले गए। इसके बाद गांव के एक युवक ने होली का डांडा वापस लाने का प्रयास किया, लेकिन वह उसे उखाड़ नहीं सका। तब से लेकर आज तक परीता गांव में होली के डांडे की सुरक्षा की जाती है।