सवाईमाधोपुर. देश भर में बाघों के संरक्षण व बाघोंं को बेहतर पर्यावास उपलब्ध कराने के लिए जहां अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं और प्रदेश व राज्य में बाघों के लिए नए टाइगर रिजर्व बनाए जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर बाघों की मौत पर भी अंकुंश नहीं लग पा रहा है। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस बात की गवाही नेशनल टाइगर कनजर्वेशन अथोरियटी (एनटीसीए) की ओर से जारी किए गए आंकड़े दे रहे है। हाल ही में एनटीसीए की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट में इस साल जनवरी व फरवरी दो माह में देश भर में 30 बाघ बाघिनों की मौत की बात सामने आई है। इन तीस में से पांच बाघ बाघिनों की मौत तो अकेले रणथम्भौर में हो चुकी है। दो माह में देश में इतनी अधिक बाघ बाघिनों की मौत ने एक बार फिर देश भर में बाघ संरक्षण और वन विभाग की कार्य प्रणाली दोनों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
इन टाइगर रिजर्व में हुई मौत
एनटीसीए की रिपोर्ट के अनुसार दो माह में रणथम्भौर, एमपी के कान्हा, पेंच, उतराखण्ड में जिम कोर्बेट,, सतपुरा, ओरंग, काजीरंगा और सत्यामंगलम टाइगर रिजर्व में ही बाघों की मौत हुई है। इनमे भी सबसे अधिक बाघों की मौत के मामले मध्यप्रदेश के टाइगर रिजर्व से सामने आए हैं। इसके अलावा तीस बाघ-बाघिनों में से 16 बाघ बाघिनों की मौत टाइगर रिजर्व के बाहर होना पाया गया है। बाघों की मौत के मामले में दूसरे नम्बर पर रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र है।
जनवरी से मार्च के बीच अधिक होती है मौत
रिपोर्ट में माना गया है कि सामान्यत: जनवरी से मार्च के बीच बाघों की मौत के मामले अधिक सामने आते हैं। हालांकि रिपोर्ट में जनवरी से मार्च के बीचबाघों की अधिक मौत होने के कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों की माने तो सर्दियों में टाइगर रिजर्व के आसपास शिकारियों की घुसपैठ में भी वृद्धि हो जाती है। रणथम्भौर में भी वन्यजीवों के शिकार के अधिकतर मामले इसी समय में सामने आए हैं। हालांकि रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर बाघों की मौत या तो प्राकृतिक मौत के रूप में हुई है या फि र इलाके को लेकर आपसी संघर्ष में बाघ-बाघिन ने दम तोड़ा है।
रणथम्भौर में कब-कब हुई बाघों की मौत
– 10 जनवरी को बाघ टी-57 की लापरवाही के चलते मौत हुई।
– 31 जनवरी को बाघिन टी-114 और उसके शावक की मौत हो गई।
-9 फरवरी को बाघिन टी-19 यानी कृष्णा की मौत हुई।
-15 फरवरी को करौली के मासलपुर में एक बाघ का शव मिला।
इनका कहना है…
एनटीसीए की ओर से पूरे देश के टाइगर रिजर्व में बाघों की मौत की जानकारी दी गई है। एक बाघ की औसत आयु 13 वर्ष के आसपास होती है। ऐसे में दो माह में अधिकतर उम्रदराज बाघों की मौत हुई है। वहीं कुछ बाघों ने संघर्ष में दम तोड़ा है। बाघों को बेहेतर पर्यावास उपलब्ध कराने के लिए टाइगर कॉरिडोर विकसित करने और वन संरक्षण की दिशा में कार्य करना होगा।
– दौलत सिंह शक्तावत, पूर्व एसीएफ रणथम्भौर और एनटीसीए प्रतिनिधि।