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अश्वगंधा की खेती कर एक किसान ने जगाई थी अलख, अब 2025 तक शमशाबाद को औषधीय तहसील बनाने का लक्ष्य

- तीन सौ बीघा में हो रही औषधीय पौधों की खेती। - आसपास के गांवों में औषधीय पौधों की खेती का बढ़ा चलन।

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भोपाल। मध्य प्रदेश में किसान खेती के मामले में इन दिनों पारंपरिक को छोड़कर व्यावसायिक और आर्गेनिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इसका एक विशिष्ठ उदाहरण विदिशा में देखने को मिल रहा है। जहां नटेरन के पाली गांव के किसान लखनलाल पाठक इसके तहत अश्वगंधा की खेती कर रहे हैं। इसके द्वारा यानि अश्वगंधा की खेती करके उन्होंने गांव की समृद्धि के नए द्वार खोल दिए हैं। ऐसे में इनसे प्रभावित होकर यहां अन्य कई किसान भी अश्वगंधा की खेती करने लगे हैं। ऐसे में अब पाली गांव अश्वगंधा व अन्य औषधीय फसलों के उत्पादन में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है।

किसान लखनलाल के अनुसार उन्होंने साल 2013 में सीहोर के कृषि महाविद्यालय में प्रशिक्षण शिविर में 'आत्मा परियोजना" के बारे में जानकारी ली। जिसके अगले वर्ष से ही उन्होंने अश्वगंधा की खेती शुरू की। उनके अनुसार वैसे तो शुरू में मन में कई सवाल आए। लेकिन फिर उन्होंने अपने खेतों पर अश्वगंधा के साथ सफेद मूसली, कलौंजी, हल्दी, सर्पगंधा जैसी औषधीय फसलों को लगाया।

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किसान लखनलाल का कहना है कि एक बीघा जमीन में दो-तीन क्विंटल अश्वगंधा का उत्पादन होता है, जिसका मूल्य 35 से 40 हजार रुपए प्रति क्विंटल मिलता है। वहीं अब इस गांव के 70 से 80 प्रतिशत किसान अश्वगंधा की ही खेती कर रहे हैं। ऐसे में गांव में लगभग तीन सौ बीघा जमीन में औषधीय खेती हो रही है। किसान पाठक के अनुसार इसके तहत औषधियों के निर्माण और विक्रय के लिए आयुष विभाग से लाइसेंस लेकर कंपनी बनाई है। वहीं इसके बाद अब पास की तहसील शमशाबाद के किसान भी अश्वगंधा की खेती करने लगे हैं। इनका मुख्य लक्ष्य शमशाबाद को 2025 तक औषधीय तहसील बनाना है।

औषधीय बूटी- अश्वगंधा (Medicinal Herb- Adhwagandha)
आयुर्वेद में अश्वगंधा को सबसे लोकप्रिय जड़ी-बूटी की ख्याति प्राप्त है, जिसके फल, फूल, बीज, पत्ती और जड़ों से लेकर इसका तना भी औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसमें बलवर्धक, स्फूर्तिदायक, स्मरणशक्ति वर्धक, तनाव रोधी, कैंसररोधी गुण पाये जाते हैं, जो शरीर से लेकर, दिल, दिमाग, खून, थायरॉइड और कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज करने में सक्षम है। यही कारण है कि कई दवा कंपनियां अश्वगंधा की कांट्रेक्ट फार्मिंग भी करवाती हैं।

खेती: कब करें
वहीं जानकारों के अनुसार अश्वगंधा की खेती रबी (Rabi Season)और खरीफ (Kharif Season)दोनों सीजन में की जाती है, लेकिन खरीफ सीजन में मानसून के बारिश के बाद इसकी रोपाई करने से अच्छा अंकुरण होता है। कृषि विशेषज्ञों की मानें तो मानसून की बारिश के दौरान इसकी पौध तैयार करनी चाहिये और अगस्त-सितंबर के बीच खेत की तैयारी करके अश्वगंधा की पछेती खेती करना फायदेमंद रहता है।

- इसके खेतों में जल निकासी की उत्तम व्यवस्था करें, क्योंकि ज्यादा पानी अश्वगंधा की क्वालिटी की खराब कर सकते हैं।
- जैविक विधि से खेती करके मिट्टी में पोषण और अच्छी नमी बनाये रखने से ही अच्छा उत्पादन मिल जाता है।
- प्रति हेक्टेयर फसल में अश्वगंधा की खेती करने पर नर्सरी में 4-5 किलेग्राम बीजों कती जरूरत पड़ती है।
- वहीं रोपाई, सिंचाई और देखभाल के बाद 5 से 6 महीने में अश्वगंधा की फसल तैयार हो जाती है।
- एक अनुमान के मुताबिक, प्रति हेक्टेयर जमीन में अश्वगंधा की खेती (Ashwagandha Farming) करने पर 10,000 का खर्च आता है, लेकिन फसल का हर हिस्सा बिकते ही 70 से 80 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है।

जानकारों का ये भी कहना है कि अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट या हल्की लाल मिट्टी में अश्वगंधा की खेती करके अच्छा उत्पादन ले सकते हैं। इसकी खेती राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हिमाचल प्रदेश के कई किसान अश्वगंधा की खेती करते हैं। अश्वगंधा उत्पादक राज्यों में मध्य प्रदेश और राजस्थान का नाम शीर्ष पर आता है। यहां मनसा, नीमच, जावड़, मानपुरा और मंदसौर और राजस्थान के नागौर और कोटा में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

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