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गरीबी हटाओ के नारे से नहीं हटती गरीबी, संतों द्वारा स्थापित संस्थाओं से प्रेरणा लें सरकारें

आनन्दपुर में संत मोरारी बापू की रामकथा

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गरीबी हटाओ के नारे से नहीं हटती गरीबी, संतों द्वारा स्थापित संस्थाओं से प्रेरणा लें सरकारें

गरीबी हटाओ के नारे से नहीं हटती गरीबी, संतों द्वारा स्थापित संस्थाओं से प्रेरणा लें सरकारें

आनन्दपुर/विदिशा.

सदगुरू सेवा संघ ट्रस्ट आनन्दपुर के रामदास हनुमान मंदिर में तीसरे दिन की रामकथा सुनाते हुए संत मोरारी बापू ने उनके पास आई जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए अपने ही अंदाज में जवाब दिए। उन्होंने दरिद्रता कैसे मिटेगी? का जवाब देते हुए कहा कि दरिद्रता मिटाने का एक ही मंत्र है-संत मिलन। उन्होंने कहा कि धन न होना गरीबी नहीं, तन की गरीबी भी मायने नहीं रखती। बस, मन की गरीबी नहीं होना चाहिए। कुछ न होना ही यदि गरीबी है तो यह जान लें कि 80 प्रतिशत लोगों के पास ईमानदारी नहीं है। बापू ने कहा कि वस्तुएं सभी को मिलना चाहिए यह सही है। सभी गरीबी मिटाने का प्रयास करते हैं, लेकिन ये काम कोई संत या संत के द्वारा स्थापित संस्था ही कर सकती है। ऐसी संस्थाओं की सेवा से राज्य और केंद्र सरकारों की बड़ी संस्थाओं को भी प्रेरणा लेना चाहिए। गरीबी तभी मिटेगी जब राम जैसे दाता और केवट जैसे लेने वाले का भाव होगा। जो निर्धन होने के बाद भी राम के दर्शन मात्र को सब कुछ पाना मानता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर संत और प्रभु कृपा से किसी की दरिद्रता खत्म होती है तो यह जरूरी है कि वह दूसरों के अभाव दूर करने का प्रयास करे।

भ्रष्टाचार कैसे मिटे...?

बापू ने भ्रष्टाचार पर बोलते हुए कहा कि भ्रष्ट लोग सत्संग नहीं करते। अगर वे सत्संग करे तो विवेक आए, विवेक नहीं आता तो उन्हें कैसे समझ आएगा कि पाप क्या और पुण्य क्या। लेकिन फिर भी भगवान पर भरोसा रखें, गुरू कृपा से धीरे-धीरे ही सही बदलाव आएगा।

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गुरू के लिए मिट्टी की तरह बन जाओ...

बापू ने गुरू के सामने किसी लालसा से मत जाओ। गुरू के सामने जाना है तो बिल्कुल मिट्टी की तरह बन जाओ। बापू ने मिटटी का उदाहरण देते हुए समझाया कि मिटटी को गेंती-फावड़े से खोदते हैं, वह कुछ नहीं कहती। उसे बर्तन में भरकर ले जाओ, गधे पर लादो, पानी डालो लेकिन वह कुछ नहीं कहती। फिर कुंभकार उसे चाक पर घुमाता है, उसे थाप मारकर आकार देता है, वह कुछ नहीं कहती। फिर तेज धूप में सुखाकर उसे आग में तपने छोड़ देता है, लेकिन मिट्टी कुछ नहीं कहती। उस मिट्टी से बने बर्तन में पानी भरो, फिर फोड़ा़े और फेंक दो, तो भी वह कुछ नहीं कहती और टुकड़े-टुकड़े में बंटकर मिट्टी खुद मिट्टी में मिल जाती है, लेकिन कभी कुछ कहती नहीं, कोई शिकायत नहीं करती। सब कुछ कुंभकार की इच्छा पर निर्भर करता है, इसी तरह जब अपने गुरू के पास जाएं तो उसके आश्रित बन जाएं, सब गुरू पर छोड़ दें, वह जैसा आकार दें, जैसा स्वरूप दें, जो करें सब कुछ बिना सवाल किए करें।

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बापू ने ब्ंजारे के घर किया भोजन

तीसरे दिन की कथा के समापन के बाद बापू टांडा चक्क के महाराज सिंह बंजारा के घर पहुंचे और वहां भोजन ग्रहण किया। महाराज सिंह ने पत्रिका को बताया कि दोपहर 12 बजे सूचना मिली की बापू भोजन करेंगे तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। घबरा भी गया कि इतने कम समय में कैसे इंतजाम होगा। लेकिन आनन-फानन में भोजन तैयार किया और मेरे घर में बापू ने भोजन ग्रहण किया।