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काशी के पंडितों को शास्त्रार्थ में हराया था सिरोंज के पंडितों ने

याद में आज भी निकाले जाते हैं निशान कलगी-तुर्रा

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काशी के पंडितों को शास्त्रार्थ में हराया था सिरोंज के पंडितों ने

काशी के पंडितों को शास्त्रार्थ में हराया था सिरोंज के पंडितों ने

सिरोंज. होली की दूज पर नगर में देर रात तक कलगी-तुर्रा का उत्साह और उल्लास दिखाई दिया। सिरोंज के विद्वानों की काशी के विद्वानों पर जीत की याद में नगर में विजयी निशान कलगी-तुर्रा के रूप में निकाले गए। देर रात तक नगर में ख्याल गायन का दौर चलता रहा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में पुलिस बल भी तैनात किया गया था।
मध्यकाल में सिरोंज के विद्वानों ने शास्त्रार्थ में काशी के विद्वानों को पराजित किया था। फलस्वरूप काशी के विद्वानों को अपने विजयी निशान तथा वाद्य यंत्र सिरोंज में ही छोड़ कर जाना पड़ा। इस जीत याद में नगर में हर साल होली की दूज पर आयोजित कलगी-तुर्रा पर्व पर विजयी निशान निकाले जाते हैं। शाम सात बजे गणेश की अथाई, रावजी पथ तथा पंचकुइयां क्षेत्र से विजयी निशान मुख्य बाजार में आए। गणेश की अथाई के निशान के साथ पं.नलिनीकांत शर्मा, विधायक उमाकांत शर्मा और उनके परिजन थे। रावजी पथ से निकले तिवारी परिवार के निशान के साथ तिवारी परिवार के लोग एवं पंचकुइयां स्थित शुक्ल परिवार के निशान के साथ राजकुमार माथुर परिवार के सदस्य शामिल हुए। इसी तरह हाजीपुर स्थित शिव मंदिर से भी एक विजयी निशान निकाला गया। 30 से 35 फीट लंबाई वाले विजय निशानों का जुलूस घेतल गली पहुंचकर समाप्त हुआ। कलगी-तुर्रा स्वांग एवं फड़ गायन की कला है। इसमें कलगी और तुर्रा दो पक्ष होते हैं। कलगी पक्ष शक्ति एवं तुर्रा पक्ष ब्रम्हा का प्रतीक होता है। दोनों पक्षों द्वारा व्यंगात्मक लहजे में तरह-तरह के स्वांग गाए जाते हैं। पहले होली की दूज, रंगपंचमी तथा गणगौर पर्व पर स्वांग गायन होता था लेकिन अब सिर्फ होली के दूज पर ही सिरोंज में यह आयोजन होता है। इस उत्सव में हाजीपुर के लोग अपने परंपरागत नृत्य करते हुए मुख्य बाजार पहुंचे। इस जुलूस में सिर पर साफा बांधे कलगी एवं तुर्रा पक्ष के लोग झांझर तथा ढपली बजाते हुए स्वांग गायन करते हुए चल रहे थे। कलगी पक्ष की टीम गणेश की अथाई तथा रावजी पथ से तथा तुर्रा पक्ष की टीम हाजीपुर तथा कंड्यापुरा कस्टम पथ की ओर से मुख्य बाजार पहुंचे थे। दोनों ही पक्ष गायन करते हुए देर रात में घेतल गली स्थित अढाई सीढ़ी पर पहुंचे। यहां पर काफी देर तक दोनों पक्षों में गायन के साथ ही प्रतीक स्वरूप वाद-विवाद भी हुआ। जो अंत में बराबरी पर खत्म हुआ।