
नई दिल्ली। Weird Tradition of Tharu Tribe Women: आज समाज और लोगों की सोच में पहले की तुलना में काफी परिवर्तन आ चुका है। परिवर्तनशील जीवन शैली का असर रहन-सहन और परंपराओं पर भी पड़ा है। आज कई पुरानी परंपराओं ने स्वयं को नया रूप देकर समय के अनुसार डाला है तो, वहीं पर कुछ रूढ़ीवादी परंपराएं एवं रीति-रिवाज उसी रूप में बरकरार हैं। कई पुरातन परंपराएं तो ऐसी हैं कि जब आज के जमाने के लोग इनसे मुखातिब होते हैं तो, उन्हें बड़ा ही आश्चर्य होता है। और वे चौंक जाते हैं कि कहीं ऐसा भी होता है भला। आज हम आपको थारू समाज में वर्तमान में भी प्रचलित ऐसी ही एक परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जो स्त्री-पुरुष की समानता के बिल्कुल विपरीत है। तो आइए जानते हैं इस अजीबोगरीब परंपरा और उसके कारण के बारे में...
आपको जानकर बड़ी हैरानी होगी कि अन्न जिसे हम माथे से लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर थारू जनजाति की महिलाएं भोजन परोसने के बाद थाली को अपने पैरों से आगे बढ़ाकर पुरुषों को देती हैं। इस अजीबोगरीब परंपरा के पीछे का कारण भी उतना ही विचित्र है।
जहां आज भी पूरे विश्व में पितृ सत्तात्मक समाज का चलन है, वहां आज भी थारू जनजाति में महिलाएं ही परिवार की मुखिया की भूमिका निभाती हैं। हालांकि महिलाओं को आगे रखना यह अच्छी बात है, लेकिन इस समाज में प्रचलित यह अजीब परंपरा इस सकारात्मक पहलू को थोड़ा धुंधला कर देती है। इसके साथ ही आश्चर्यजनक बात यह भी है कि इसी विचित्र परंपरा से थारुओं में मातृ सत्तात्मकता का बीज अंकुरित हुआ था। जिसके पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।
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एक शोध के अनुसार, हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान सन् 1576 में महाराणा प्रताप के सिपाहियों ने अपने परिवारों की सुरक्षा के लिए अपने सेवकों के साथ उन्हें हिमालय की तलहटी में भेज दिया था। रास्ता भटकने के कारण ये लोग नेपाल सीमा से सटे हुए उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र तक पहुंचे। और फिर यहीं के जिलों में अपना बसेरा बना लिया। राजस्थान के थार इलाके से आए इन्हीं लोगों को बाद में थारू कहा जाने लगा।
सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए इन महिलाओं ने अपने साथ आए सैनिकों और सेवकों से विवाह कर लिया। यूं तो उन युवतियों ने अपने सेवकों से शादी तो कर ली परंतु वे अपनी कुलीन उच्चता के अहसास को नहीं त्याग सकीं। उनका विवाह समझौता बनके रह गया, जो उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए किया था। ऊंच-नीच के एहसास के कारण वे अपने घमंड को छोड़ नहीं पाई। और इसी वजह से जब भी वे पुरुषों को भोजन परोसती थीं तो, थाली को पैर से ठोकर मारकर देती थीं। क्योंकि इससे उनका राजसी घमंड तुष्ट होता था। उनके इसी तरीके ने धीरे-धीरे परंपरा का रूप ले लिया।
हालांकि बदलते सामाजिक स्वरूप और सोच ने मालिक और सेवक के अंतर को पाट दिया है, जिससे यह परंपरा थोड़ी फीकी जरूर पड़ गई है, परंतु आज भी यह चलन में है। आपको बता दें कि राजवंशी होने के अहसास के कारण से ही थारू जनजाति की महिलाएं रानियों की तरह आभूषण पहनकर सजती-संवरती हैं। साथ ही वे स्वयं को को परिवार का मुखिया भी मानती हैं।
वैसे कई सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव भी इस अजीबोगरीब परंपरा और जनजाति पर पड़ रहा है और यह समाज अब शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ रहा है। इसी प्रकार लोगों की शिक्षित होने के साथ ही विभिन्न सामाजिक कुरीतियां समाप्ति की ओर हैं।
Updated on:
08 Oct 2021 06:12 pm
Published on:
08 Oct 2021 06:10 pm
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