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क्या आत्महत्या से वाकई में मिलती है कष्टों से मुक्ति या होती है इसकी शुरूआत, सच्चाई जान कांप जाएगी रूह

मानव जीवन को सभी योनियों में सबसे उत्तम माना गया है। ऐसे में आत्महत्या कर अपनी जिदंगी को जब इंसान खत्म कर देता है तो इसे पाप के तौर पर लिया जाता है।

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Arijita Sen

Jul 08, 2018

Suicide

क्या आत्महत्या से वाकई में मिलती है कष्टों से मुक्ति या होती है इसकी शुरूआत, सच्चाई जान कांप जाएगी रूह

नई दिल्ली। संसार में कुल चौरासी लाख योनियां हैं। आत्मा इन चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है। इन योनियों में घूमते हुए वह मनुष्य जन्म प्राप्त करता है।

इस बात से हम समझ सकते हैं कि मनुष्य योनी बड़ी ही मुश्किल से मिलती है।मानव जीवन को सभी योनियों में सबसे उत्तम माना गया है। यहां तक कि देवता भी मनुष्य योनि में जन्म लेने के लिए तरसते हैं।

ऐसे में आत्महत्या कर अपनी जिदंगी को जब इंसान खत्म कर देता है तो इसे पाप के तौर पर लिया जाता है। आत्महत्या को कानूनी तौर पर भी अपराध माना गया है।

शास्त्रों में ऐसा लिखा गया है कि आत्महत्या के बाद का जीवन पहले के जीवन की अपेक्षा ज्यादा कष्टकारी होता है। हम जिंदगी के कष्टों से भागने के लिए खुद को खत्म कर देते हैं इस आशा के साथ कि अब हमें मुक्ति मिल जाएगी जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है, क्योंकि मृत्यु से केवल हमारा शरीर मरता है। शरीर के मरने से हमें शारीरिक दुखों से तो बड़ी ही आसानी से मुक्ति मिल जाती है, लेकिन मानसिक शांति हमें नहीं मिलती।

आत्महत्या को महापाप इसलिए कहा गया है क्योंकि ऐसा करके लोग प्रकृति के विपरीत कदम उठाते हैं जो कि उचित नहीं है। मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। संसार में जो भी जीव जन्म लेता है उसकी मौत के लिए एक निर्धारित सीमा तक की जाती है। इस दौरान वह अपने कर्मो के आधार पर सुख और दुख भोगता है। ऐसे में जिंदगी की परेशानियों से तंग आकर जो लोग प्रकृति के नियम के विपरीत जाकर समय से पहले ही अपनी मृत्यु निर्धारित करते हैं, उन्हें आसानी से मुक्ति नहीं मिल पाती है।

ऐसा कहा गया है कि आत्महत्या करने के बाद आत्मा शरीर से निकलकर अधर में लटक जाती है। यानि कि ना तो वह स्वर्ग जा पाती है ना ही नरक जा पाती है और ना ही वह पुन: अपने जीवन में वापस आ पाती है। वह एक अतृप्त आत्मा के रूप में बस भटकती रहती है। उसे तब तक मुक्ति नहीं मिल पाती है जब तक उसका मृत्यु के लिए उसका निर्धारित समय पूरा नहीं हो जाता।

बता दें, मानव जीवन ? के कुल सात चरण होते हैं जिन्हें पूरा करने के बाद ही इंसान की मृत्यु होती है। इन चरणों को पूरा किए बिना मृत्यु हो जाने से आत्मा भटकती रहती है। एक भटकती हुई आत्मा जीवन में वापस जाने की लालसा और अपनी ख्वाहिशों के अधूरे रह जाने से तड़पती रहती है। इसके साथ ही वह हमेशा अपने परिजनों को भी परेशान करती रहती है।