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दक्षिण पूर्व एशिया के इस देश में गर्व से लहरा रहा है भगवा झंडा, भारत से सदियों पुराना है रिश्ता

थाईलैंड में हिंदू देवताओं के मंदिर और भारतीय सभ्यता बहुत आम बात है। मगर आपको बता दें, यहां कि यह हिंदू सभ्यता भारत की देन है। हिंदू धर्म और उसके संस्कार यहां भारत से ही पहुंचा है। भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का इतिहास बहुत ही लंबा है।

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Archana Keshri

Dec 05, 2022

Hindu Deities worshipped in Thailand, Buddhist country that still holds on to its Hindu past

Hindu Deities worshipped in Thailand, Buddhist country that still holds on to its Hindu past

भारत की सनातन संस्कृति का दुनिया पर गहरा प्रभाव रहा है। आज भी कई देश ऐसे हैं जहां सनातन संस्कृति के प्रतीक चिह्न बड़े शान से अंकित हैं। इन देशों में से एक देश है दक्षिण एशियाई देश थाईलैंड। थाईलैंड में प्रचलित मुख्य धर्म बौद्ध धर्म है, इसके बावजूद यहां हिंदू देवताओं की मूर्तियों और मंदिरों का दृश्य बहुत आम है। यहां कई हिंदू मंदिर हैं। कुछ नए दौर के तो कुछ बहुत ही प्राचीन। हालांकि उन देवताओं का आमतौर पर हिंदू धर्म की तुलना में थाई में एक अलग नाम है। इसके अलावा यहां हिंदू धर्म का पताका यानी कि भगवा झंडा शान से लहरा रहा है। अब आप यह सोच रहे होंगे कि आखिर यहां हिंदू धर्म पहुंचा कैसे?

धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का लंबा इतिहास
भारत और थाईलैंड के बीच साझी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का लंबा इतिहास है। थाईलैंड ऐतिहासिक रूप से सियाम के रूप में जाना जाता था, जिसे आधिकारिक तौर पर थाईलैंड के गणराज्य के रूप में जाना जाता है। 7 करोड़ से भी ज्यादा यानी 95 फीसदी से भी ज्यादा लोग बौद्ध धर्म के हैं, जबकि हिंदू 0.02 फीसदी है। मगर फिर भी पूरे थाईलैंड में इंद्र, ब्रह्मा, गणेश, गरुण, शिव के मंदिर दिखाई देते हैं। इनमें से कई 800-1000 साल पुराने हैं तो कुछ नए दौर के हैं।

हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा करते हैं बौद्ध धर्म के लोग
हैरानी की बात ये है कि यहां के हिंदू मंदिरों में बौद्ध धर्म को मानने वाले भी आते हैं और वे हिंदू देवी-देवताओं की पूजा वैसे ही करते हैं, जैसे हिंदू उनकी पूजा करते हैं। दरअसल, थाईलैंड में ब्रह्म लुआंग (रॉयल ब्राह्मण) और ब्रह्म चाओ बान (लोक ब्राह्मण) नाम के दो थाई ब्राह्मण समुदाय रहते हैं। सभी थाई ब्राह्मण धर्मों से बौद्ध हैं, लेकिन ये हिंदू देवताओं की पूजा करते हैं। ब्रह्म लुआंग मुख्य रूप से थाई राजा के शाही समारोह करते हैं, जिसमें राजा का राज्याभिषेक भी शामिल होता है। इनकी जड़ें भारत के तमिलनाडु से जुड़ी हुई हैं। वहीं, ब्रह्म चाओ बान वे ब्राह्मण समुदाय हैं, जो पूजा पाठ नहीं करते।

दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर मिलती है भारत की छाप
हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य और शास्त्रों में सुवर्णभूमि के कई संदर्भ हैं, जो वर्तमान 'दक्षिण पूर्व एशिया' और विशेष रूप से थाईलैंड का उल्लेख करते हैं। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों पर भारत की छाप का गहन अध्ययन करने वाले पहले व्यक्ति फ्रांसीसी विद्वान जॉर्ज कोएड्स थे। उन्होंने बताया था कि वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड, म्यांमार और मलय पर किस तरह भारत की छाप मिलती है। खासकर थाईलैंड से तो करीब 2,000 साल का संबंध है।

व्यापारियों के माध्यम से थाईलैंड पहुंचा हिंदू धर्म
थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक और इसके अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम सुवर्णभूमि हवाई अड्डा है। इसका नाम राजा भूमिलबोल अदुल्यादेज ने रखा था, जो बौद्ध और हिंदू धर्मग्रंथों के उत्साही पाठक थे। हवाई अड्डे पर समुद्र मंथन का एक दृश्य भी दिखाया गया है, जो हिंदू धर्म के लिए महत्वपूर्ण दैवीय घटना है। ऐसा माना जाता है कि थाईलैंड में हिंदू धर्म सबसे पहले उन व्यापारियों के माध्यम से आया, जिन्होंने सुवर्णभूमि की यात्रा की थी। बता दें, भारत के संस्कृति और पाली ग्रंथों में थाईलैंड को सुवर्णभूमि (ईश्वर की भूमि) बताया गया है।

समुद्री रास्ते से थाईलैंड पहुंचे करोबारी
हालांकि ये कहानी चौथी शताब्दी से शुरू होती है। थाईलैंड और भारत के हिंदू धर्म से रिश्ता समझने से पहले हमें दो भाषाओं को समझना होगा। एक है थाई स्क्रिप्ट और दूसरी पल्लव स्क्रिप्ट। पल्लव स्किप्ट एक ऐसी भाषा थी जो दक्षिण भारत में पल्लव राजवंश के दौर में उभरी और इसे वहीं से पहचान भी मिली। आज के चेन्नई से अगर थाईलैंड के दक्षिणी हिस्से में स्थित इसकी राजधानी बैंकॉक का समुद्री रास्ता देखें तो ये एक सीधी रेखा मालूम होती है। जाहिर है कारोबारियों ने दक्षिण पूर्व एशिया का रुख किया और फिर पल्लव स्क्रिप्ट ने ही बालीनीज, बेबेइन, जावानीज, कावी खमेर, लान्ना, मोन और बर्मीज भाषा को जन्म दिया।

खमेर साम्राज्य ने हिंदू धर्म को बनाया था थाईलैंज का मुख्य धर्म
मगर आपको बता दें, हिंदू धर्म सीधे भारत से थाइलैंड नहीं पहुंचा। थाईलैंज के पड़ोसी देश कंबोडिया ने यहां हिंदू धर्म का प्रसार किया। इसका मुख्य श्रेय खमेर साम्राज्य को जाता है। बता दें, थाईलैंड में सोम साम्राज्य, खमेर साम्राज्य और मलय राज्यों जैसे विभिन्न भारतीय साम्राज्यों ने शासन किया था। वहीं जब तक थाईलैंड में खमेर साम्राज्य सत्ता में थी, तब तक वहां हिंदू धर्म प्रमुख धर्म बना रहा। थाई के बीच हिंदू धर्म का प्रभाव आज भी बना हुआ है।

भाषा के जरीए हिंदू धर्म का हुआ थाईलैंड में आगमन
खमेर स्क्रिप्ट यानी कि कम्बोडियन स्क्रिप्ट पुरानी तमिल पल्लव स्क्रिप्ट से निकली है और थाई स्क्रिप्ट, खमेर स्क्रिप्ट से निकली है। इसलिए आज भी थाई और पुरानी तमिल लिपियों के बीच समानताएं मिलती हैं। जैसा कि भाषा का जुड़ाव संस्कृचि से होता है और संस्कृति का जुड़ाव धर्म से। भाषा की इसी डोर ने थाईलैंड सहित दक्षिण पूर्व एशिया पर अपनी छाप छोड़ दी। जिसके बाद भाषा के रास्ते ही हिंदू धर्म का थाईलैंड में आगमन हुआ।

रामायण को माना जाता है राष्ट्रीय 'महाकाव्य'
बता दें, भारत का धार्मिक ग्रंथ रामायण भी भारत के व्यापारिक मार्गों से 7वीं शताब्दी की शुरुआत में थाईलैंड पहुंची थी। थाईलैंड में इसे एक नए रूप में स्वीकार किया गया। थाईलैंड में 'रामायण' के संस्करण को 'रामकियन' कहा जाता है, जो इस देश का राष्ट्रीय 'महाकाव्य' माना जाता है। थाईलैंड के लोगग रामायण की कथा को हिंदुओं की तरह ही गंभीरता से लेते हैं। थाईलैंड की पूर्व राजधानी अयुत्या का नाम अयोध्या के नाम पर रखा गया था, जो भगवान राम का जन्मस्थान है। जबकि भारत के अयोध्या से यह 3500 किलोमीटर दूर स्थित है। हालांकि अयुत्या साम्राज्य का मुख्य धर्म बौध था, पर हिंदू धर्मग्रंथों का इसकी संस्कृति और समाज पर एक बड़ा प्रभाव था।

भगवान गणेश की पूजा करते हैं थाई बौद्ध
थाईलैंड में आज भी हिंदू धर्म के प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां राजा को राम की पदवी के नाम से जाना जाता है। जबकि चक्री राजवंश के राज्याभिषेक अभी भी हिंदू ब्राह्मण पुजारियों द्वारा किए जाते हैं। वहीं, यहां आपको मुख्य रूप से भगवान गणेश की मुर्तियां मंदिरों में मिल जाएंगी। भगवान गणेश को भारत के जैसे ही, थाई बौद्धों द्वारा विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। थाईलैंड में गणेश 'फ्ररा फिकानेत' के रूप में पूजे जाते हैं।

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