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अमेरिका का सनसनीखेज दावा: चीन ने दुनिया से छिपा कर किया परमाणु परीक्षण, रूस के लिए कही ये बड़ी बात

Covert Operation: अमेरिका ने चीन पर 2020 में रूस की मदद से दुनिया से छिपाकर गुप्त परमाणु परीक्षण करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस खुलासे के बाद वैश्विक हथियार नियंत्रण संधियां खतरे में पड़ गई हैं और महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों की नई होड़ शुरू होने की आशंका गहरा गई है।

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भारत

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MI Zahir

Feb 07, 2026

China Secret Nuclear Test

चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किया। ( फोटो: द वॅाशिंगटन पोस्ट)

Accusation: दुनिया की महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों की होड़ एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिका ने चीन पर एक बहुत गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाया है। अमेरिका के शीर्ष हथियार नियंत्रण अधिकारी थॉमस डिनानो ने दावा किया है (US China Relations) कि चीन ने साल 2020 में दुनिया की नजरों से बचा कर एक गुप्त परमाणु परीक्षण (Secret Nuclear Test) किया था। जिनेवा में निरस्त्रीकरण सम्मेलन के दौरान अमेरिका ने कहा कि बीजिंग ने 22 जून, 2020 को एक कम क्षमता वाला 'विस्फोटक परीक्षण' (China Nuclear Test 2020) किया और इसे छिपाने के लिए अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणालियों (Seismic Monitoring Systems) के डेटा के साथ छेड़छाड़ भी की। यह आरोप ऐसे समय में आया है जब परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाली पुरानी संधियां दम तोड़ रही हैं।

अमेरिका रूस के साथ 'न्यू स्टार्ट' समझौता आगे नहीं बढ़ाएगा

अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह रूस के साथ 'न्यू स्टार्ट' (New START) समझौते को आगे नहीं बढ़ाएगा। अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि दशकों पुराना 'परमाणु परीक्षण स्थगन' (Moratorium) अब बेमानी हो चुका है क्योंकि रूस और चीन इसका पालन नहीं कर रहे हैं। अमेरिका का आरोप है कि रूस न केवल अपने यहां गुप्त परीक्षण कर रहा है, बल्कि वह चीन को परमाणु हथियारों के लिए जरूरी 'विखंडनीय सामग्री' (Weapons-grade fissile material) विकसित करने में भी मदद कर रहा है। इस विवाद के केंद्र में चीन का लोप नुर (Lop Nur) परीक्षण स्थल है।

चीन अपने परमाणु जखीरे बहुत तेजी से बढ़ा रहा

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और सैटेलाइट इमेजरी के विश्लेषण से पता चला है कि इस इलाके में संदिग्ध गतिविधियां बढ़ी हैं। पेंटागन की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अपने परमाणु जखीरे बहुत तेजी से बढ़ा रहा है। वर्तमान में चीन के पास करीब 600 परमाणु हथियार हैं, जिनके 2030 तक 1,000 होने का अनुमान है। हालांकि, यह संख्या अभी भी रूस (4,300) और अमेरिका (3,700) के मुकाबले कम है, लेकिन चीन की विस्तारवादी नीति ने वाशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका अब चाहता है कि परमाणु नियंत्रण की किसी भी नई संधि में रूस के साथ-साथ चीन को भी शामिल किया जाए। व्हाइट हाउस का मानना है कि शीत युद्ध के दौर की संधियां आज के खतरों से निपटने में सक्षम नहीं हैं।

हम पहले उपयोग न करने की नीति पर कायम: चीन

उधर, चीन ने इन आरोपों पर सीधी प्रतिक्रिया देने के बजाय कहा है कि वह 'पहले उपयोग न करने' (No First Use) की नीति पर कायम है। हालांकि, चीन ने अब तक सीटीबीटी (CTBT) संधि पर हस्ताक्षर तो किए हैं लेकिन उसे रेतीफाई (पुष्टि) नहीं किया है, जिससे संदेह और गहराता है कि क्या वास्तव में एशिया में परमाणु हथियारों की एक नई और गुप्त रेस शुरू हो चुकी है।

वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं

चीन का बचाव: वाशिंगटन में चीनी दूतावास के प्रवक्ता लियू पेंग्यु ने कहा कि अमेरिका को निराधार आरोप लगाने के बजाय परमाणु निरस्त्रीकरण पर अपनी प्रतिबद्धता निभानी चाहिए। चीन ने जोर देकर कहा कि वह स्वैच्छिक स्थगन का पालन कर रहा है।

विशेषज्ञों की राय: कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के परमाणु विशेषज्ञ टोंग झाओ का कहना है कि अमेरिका की ओर से तारीख और विवरण के साथ लगाया गया यह आरोप अभूतपूर्व है। इससे बीजिंग पर स्पष्टीकरण देने का भारी दबाव बनेगा।

कूटनीतिक तनाव: विश्लेषकों का मानना है कि इस आरोप के बाद अमेरिका और चीन के बीच पहले से ठप पड़ी परमाणु वार्ता (Nuclear Dialogue) के फिर से शुरू होने की संभावनाएं लगभग खत्म हो गई हैं।

सैटेलाइट निगरानी: आने वाले दिनों में लोप नुर साइट की सैटेलाइट तस्वीरें और अधिक चर्चा का विषय बनेंगी। विश्लेषक वहां बन रही नई सुरंगों और बोरहोल की गहराई से जांच करेंगे।

अमेरिकी कदम: राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से 'तत्काल' परमाणु परीक्षण शुरू करने के आदेश के बाद, नेवादा रेगिस्तान में अमेरिकी परीक्षण स्थलों पर हलचल बढ़ सकती है। दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि क्या अमेरिका 1992 के बाद पहला धमाका करता है।

नई संधि का भविष्य: अमेरिका अब एक "आधुनिक" समझौते का मसौदा तैयार करने की कोशिश करेगा, लेकिन चीन के इनकार और रूस के साथ तनाव के चलते इसके सफल होने की उम्मीद न के बराबर है।

'जीरो-यील्ड' बनाम 'लो-यील्ड' का खेल इस पूरे विवाद में तकनीकी पहलू सबसे अहम है।

जीरो-यील्ड (Zero-Yield): अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, परीक्षण ऐसा होना चाहिए हकि जिसमें कोई परमाणु चेन रिएक्शन न हो और कोई विस्फोटक ऊर्जा न निकले। अमेरिका का आरोप है कि चीन ने इस सीमा को पार किया है।

पकड़ना मुश्किल: 'लो-यील्ड' यानि कम क्षमता वाले परमाणु धमाकों को भूकंपीय यंत्रों (Seismometers) से पकड़ना बहुत मुश्किल होता है, खासकर अगर उन्हें गहरी सुरंगों में किया जाए। चीन इसी तकनीकी खामी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है, जिससे यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि वह सिर्फ कंप्यूटर सिमुलेशन कर रहा है या वास्तविक धमाका।

(इनपुट क्रेडिट: अमेरिकी विदेश विभाग के बयान और पेंटागन की वार्षिक रिपोर्ट।)