
भारत-पाक ने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान-प्रदान किया। (फोटो: X Handke/ The Tatva)
Protocol: दुनिया के दो परमाणु शक्ति संपन्न (Nuclear) पड़ोसी देशों, भारत और पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अत्यंत गोपनीय जानकारी एक-दूसरे से शेयर की है। हर साल की पहली तारीख को होने वाली यह कूटनीतिक (Diplomatic) रस्म इस बार भी पूरी गरिमा के साथ निभाई गई। रिश्तों में जमी बर्फ के बीच इस कदम को दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नए साल के पहले दिन, नई दिल्ली और इस्लामाबाद ने अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों (Nuclear Installations) की सूची का आदान-प्रदान (Exchange)किया। यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक संधि का हिस्सा है। दरअसल, 31 दिसंबर 1988 को दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसे 'परमाणु ठिकानों पर हमले के निषेध का समझौता' कहा जाता है।
इस संधि का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध या संघर्ष की स्थिति में दोनों में से कोई भी देश एक-दूसरे के न्यूक्लियर सेंटर्स को निशाना नहीं बनाएगा। साल 1991 में लागू होने के बाद से, पिछले 35 वर्षों से लगातार हर 1 जनवरी को यह डेटा शेयर किया जाता है।
परमाणु डेटा के साथ-साथ, दोनों देशों ने अपनी जेलों में बंद एक-दूसरे के नागरिकों और मछुआरों की सूची भी शेयर की। भारत ने पाकिस्तान से उन भारतीय मछुआरों को जल्द से जल्द रिहा करने की मांग की है, जो अपनी कानूनी सजा पूरी कर चुके हैं। मानवीय आधार पर यह प्रक्रिया बहुत जरूरी है क्योंकि कई निर्दोष नागरिक और मछुआरे अनजाने में सीमा पार करने के कारण बरसों तक जेलों में बंद रहते हैं।
भारत ने यह बात साफ की है कि पाकिस्तानी जेलों में बंद भारतीय कैदियों की सुरक्षा और उनकी घर वापसी उसकी प्राथमिकता है। इसके लिए नई दिल्ली ने इस्लामाबाद से 'कांसुलर एक्सेस' और मेडिकल सहायता की भी अपील की है।
इस साल के आदान-प्रदान को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पाकिस्तानी अधिकारियों के बीच हाल ही में कूटनीतिक स्तर पर कुछ अनौपचारिक संवाद हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत लंबे समय से बंद है, लेकिन इस तरह के प्रोटोकॉल का पालन करना यह दर्शाता है कि दोनों पक्ष परमाणु सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही या गलतफहमी नहीं चाहते।
भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु हथियारों से लैस हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की सैन्य गलतफहमी (Miscalculation) पूरे क्षेत्र के लिए तबाही ला सकती है। परमाणु प्रतिष्ठानों की लोकेशन शेयर करने से यह सुनिश्चित होता है कि रणनीतिक योजना बनाते समय इन संवेदनशील स्थानों को सुरक्षित रखा जाए। इसमें परमाणु अनुसंधान केंद्र, यूरेनियम भंडार और बिजली संयंत्र जैसे ठिकाने शामिल हैं।
पिछले कुछ बरसों के दौरान कश्मीर मुद्दे और सीमा पार आतंकवाद के कारण दोनों देशों के संबंधों में भारी गिरावट आई है। व्यापारिक और राजनीतिक संबंध लगभग शून्य हैं। लेकिन, 'न्यूक्लियर डेटा एक्सचेंज' और 'प्रिजनर लिस्ट' का शेयर करना यह साबित करता है कि गंभीर मतभेदों के बावजूद, कुछ सुरक्षा प्रोटोकॉल ऐसे हैं जिन्हें तोड़ा नहीं जा सकता। यह कदम न केवल दोनों देशों,बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी राहत की खबर है।
नए साल पर हुआ यह कूटनीतिक लेन-देन भले ही एक नियमित अभ्यास हो, लेकिन इसकी अहमियत को कम नहीं आंका जा सकता। यह प्रक्रिया हमें याद दिलाती है कि दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या यह छोटा सा कूटनीतिक कदम भविष्य में दोनों देशों के बीच शांति और स्थिरता की किसी नई शुरुआत का आधार बन पाएगा या नहीं।
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Updated on:
01 Jan 2026 04:58 pm
Published on:
01 Jan 2026 04:57 pm
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