
Benjamin Netanyahu, Donald Trump and Ali Khamenei (Photo - Patrika Network)
Unrest: ईरान इस वक्त इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है। हालत यह है कि देश की सड़कों पर बारूद की गंध बिखरी हुई है, तो बाज़ारों में सन्नाटा छाया हुआ है। लेकिन इस पूरे बवाल के केंद्र में दो नाम सबसे प्रमुखता से उभर रहे हैं— डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू। ऐसा दावा किया जा रहा है कि फ्लोरिडा में हुई इन दो दिग्गज नेताओं की 'सीक्रेट मीटिंग' (Trump Netanyahu Meeting)ने ईरान के अंदर उस गुस्से को भड़का (Iranian Rial Crash) दिया है, जो दशकों से दबा हुआ था। हाल ही में मार-ए-लागो में नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच एक बंद कमरे में लंबी चर्चा हुई। इस मुलाकात के फौरन बाद ईरान के अंदर अचानक विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आ गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बैठक का मुख्य एजेंडा ईरान की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति को अगले स्तर पर ले जाना था। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारियों को 'ईरानी देशभक्त' बताते हुए सीधे तौर पर समर्थन दे दिया है। कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अमेरिका और इजराइल मिल कर ईरान के अंदर सक्रिय विपक्षी गुटों को गुप्त रूप से खाद-पानी दे रहे हैं, ताकि वहां की कट्टरपंथी हुकूमत को घुटनों पर लाया जा सके।
विद्रोह की आग में घी डालने का काम ईरान की बर्बाद होती अर्थव्यवस्था ने किया है। ईरान की मुद्रा 'रियाल' ताश के पत्तों की तरह ढह गई है।
ऐतिहासिक गिरावट: अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत अब 15 लाख रियाल के पार पहुंच गई है।
महंगाई का तांडव: ईरान के आम नागरिक के लिए एक वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी दूभर हो गया है। अंडे, दूध और ब्रेड जैसी बुनियादी चीजों की कीमतें 300% तक बढ़ गई हैं।
बाज़ार में ताले: तेहरान का ऐतिहासिक 'ग्रैंड बाज़ार' बंद है। व्यापारियों का कहना है कि जब मुद्रा की कोई कीमत ही नहीं बची, तो व्यापार कैसे करें? यही आर्थिक तंगी अब राजनीतिक गुस्से में बदल चुकी है।
ईरानी हुकूमत: ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने इस विद्रोह को "विदेशी साजिश" करार दिया है। ईरान का दावा है कि मोसाद (इजराइल की खुफिया एजेंसी) और सीआईए ने मिल कर देश में दंगे भड़काए हैं। सुरक्षा बलों को 'शूट एट साइट' के आदेश दिए गए हैं, इस कारण अब तक सैकड़ों मौतें होने की खबर है।
आम जनता: प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई अब सिर्फ हिजाब या महंगाई की नहीं, बल्कि 'आज़ादी' की है। "तानाशाह की मौत" के नारे तेहरान से लेकर मशहद तक गूंज रहे हैं।
आने वाले दिन ईरान के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। यदि ट्रंप प्रशासन ईरान पर और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, तो रियाल का मूल्य शून्य के करीब पहुंच सकता है। दूसरी ओर, इजराइल ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले करने की फिराक में है। अगर प्रदर्शनकारी तेहरान के सरकारी रेडियो और टीवी स्टेशनों पर कब्जा करने में सफल रहे, तो ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, ईरान के इस संकट में रूस और चीन की भूमिका दिलचस्प है। जहां रूस यूक्रेन युद्ध में ईरान के ड्रोन्स पर निर्भर है, वहीं चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। ईरान में अस्थिरता का मतलब है वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल। यदि ईरान की सत्ता गिरती है, तो मध्य पूर्व (Middle East) में रूस और चीन का प्रभाव खत्म हो जाएगा, जो सीधे तौर पर अमेरिका की बड़ी जीत होगी।
Published on:
15 Jan 2026 03:17 pm
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