
जंग के बीच ट्रंप और नेतन्याहू ने ईरान से समझौते की शर्त रखी। (फोटो: AI)
Geopolitics : मध्य पूर्व (Middle East Crisis) में जारी भीषण जंग (Israel Iran Conflict) के बीच भू-राजनीति एक नए और निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। इजराइल और अमेरिका के भारी सैन्य व आर्थिक दबाव के चलते ईरान बुरी तरह से घिर गया है। इजराइल ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वर्तमान ईरानी शासन (Iran Regime) के लिए अब 'गेम ओवर' हो चुका है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कूटनीतिक रास्ता खुला रखते हुए कहा है कि वह ईरान के साथ नए सिरे से बातचीत करने के लिए तैयार हैं, लेकिन कोई भी नया समझौता पूरी तरह से 'अमेरिकी शर्तों' (Donald Trump Iran Deal) पर ही आधारित होगा। इजराइल ने ईरान के खिलाफ अपने हालिया सैन्य अभियानों और बड़े हवाई हमलों के बाद दावा किया है कि इस्लामिक रिपब्लिक का पतन अब तय है। ताज़ा रिपोर्ट्स और हालिया '12-दिवसीय युद्ध' के झटकों ने ईरान के वायु रक्षा तंत्र और परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
इजराइली नेतृत्व का मानना है कि हमास और हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी गुटों के कमजोर होने के बाद ईरान की क्षेत्रीय ताकत लगभग खत्म हो चुकी है।
आंतरिक विद्रोह: इजराइल का यह भी आकलन है कि ईरान के भीतर उठ रही सुधारवादी आवाजों और सत्ता विरोधी लहर के कारण, ईरानी शासन के लिए अब इस झटके से उबरना और पलटवार करना लगभग असंभव है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस पूरे परिदृश्य में 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) की नीति अपना रहे हैं। उन्होंने मध्य पूर्व में अमेरिका की भारी सैन्य ताकत तैनात कर दी है, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया है कि वह सीधे युद्ध के बजाय एक 'डील' (समझौते) को प्राथमिकता देते हैं।
परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण रोक:ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह और स्थायी रूप से बंद करना होगा।
मिलिशिया को समर्थन बंद करना: मध्य पूर्व में फैले अपने प्रॉक्सी नेटवर्क (हूतियों, हिजबुल्लाह आदि) की फंडिंग और हथियारों की सप्लाई को तत्काल रोकना होगा।
साफ तौर पर संदेश: ट्रंप का स्पष्ट रुख है कि या तो ईरान उनकी कठोर शर्तों को मानकर एकतरफा समझौता करे, या फिर कड़े सैन्य प्रहार और 'शासन परिवर्तन' (Regime Change) का सामना करने के लिए तैयार रहे।
ईरान इस समय चौतरफा संकट में है। देश के भीतर कड़े अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों और लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण सत्ता पर भारी दबाव है। हालांकि, ईरानी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से झुकने को तैयार नहीं दिख रहा है और इसे "पश्चिमी साम्राज्यवाद" के खिलाफ लड़ाई बता रहा है, लेकिन बैकचैनल (पर्दे के पीछे) वार्ता की सुगबुगाहट तेज है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्की के इस्तांबुल में अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधियों के बीच संभावित मध्यस्थता की चर्चाएं हैं। ईरान की कोशिश है कि वह अपना सम्मान बचाते हुए इस संकट से बाहर निकल सके।
अलग-थलग पड़ा ईरान: रूस और चीन जैसे ईरान के रणनीतिक साझेदार सीधे तौर पर इस सैन्य टकराव में पड़ने से बच रहे हैं। चीन ईरान से सस्ता तेल जरूर खरीद रहा है, लेकिन किसी भी प्रकार की सैन्य संधि या सीधे बचाव से उसने किनारा कर लिया है।
वैश्विक कूटनीति: विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का लक्ष्य ईरान को इतना कमजोर कर देना है कि उसके पास अमेरिकी शर्तों पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई विकल्प न बचे।
बहरहाल, वर्तमान परिस्थितियां स्पष्ट करती हैं कि यदि ईरान, अमेरिका और इजराइल की शर्तों के आगे झुकता है, तो यह ट्रंप प्रशासन और इजराइल की एक ऐतिहासिक रणनीतिक जीत होगी। वहीं, अगर वार्ता विफल होती है, तो क्षेत्र में वार्ता विफल रही तो विनाशकारी युद्ध लंबा चलेगा, जिसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक शांति पर पड़ेगा।
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Updated on:
10 Mar 2026 07:40 pm
Published on:
10 Mar 2026 07:33 pm
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