
इस्लामिक स्टेट ने एआई एहतियात मैनुअल जारी किया। ( फोटो: AI)
Terror Technology : इस्लामिक स्टेट ने तकनीकी रूप से खुद को मजबूत कर आतंक का साम्राज्य स्थापित कर लिया है। आज आलम यह है कि तकनीकी तौर पर खुद को अपग्रेड करने के मामले में इस्लामिक स्टेट हाल के दिनों में सबसे आगे रहने वाला आतंकी संगठन बन कर सामने आया है। ध्यान रहे कि साल 2013 के उत्तरार्ध में जब इसने सीरिया और इराक की धरती पर अपनी गतिविधियां शुरू की थीं, तब इसका खौफ का माहौल तैयार करने पर पूरा जोर था। इस मकसद को पूरा करने के लिए संगठन ने हॉलीवुड स्तर के स्टूडियो तक बनाए, जहां बंधकों के सिर कलम करने वाले क्रूर वीडियो तैयार किए जाते थे।
इनमें से कई वीडियो पूरी तरह फर्जी थे, जबकि कुछ वास्तविक भी थे। इन वीडियो को हर तरफ फैलाने के पीछे संगठन की मंशा दुनिया में अपनी दहशत का सिक्का जमाना था। इस्लामिक स्टेट की यह चाल बहुत हद तक कामयाब रही और इसके जाल में फंस कर कई युवा इस गिरोह में शामिल भी हो गए। इसके बाद के दौर में संगठन ने कट्टरपंथ को बढ़ावा देने और अपना एजेंडा चलाने के लिए पूरी तरह से एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का सहारा लिया। आज के समय में यह समूह अपनी खुद की पत्रिकाएं छापता है और अपने पाठकों को नियमित तौर पर डिजिटल न्यूजलेटर भी भेजता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की नई तकनीक का आना भी इस आतंकी गुट के लिए काफी मददगार साबित हुआ है। एआई की मदद से यह संगठन धड़ल्ले से प्रोपेगैंडा वीडियो तैयार कर रहा है। आधुनिक सॉफ्टवेयर की बदौलत ये खतरनाक वीडियो अब दुनिया की कई भाषाओं में आसानी से उपलब्ध हैं।
एक तरफ जहां इस्लामिक स्टेट अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए तकनीक का जमकर इस्तेमाल कर रहा है, वहीं अब वह अपने गुर्गों को एआई के इस्तेमाल में बेहद सावधानी बरतने की नसीहत भी दे रहा है। आतंकी संगठन इस बात को भांप चुका है कि तकनीक के बेलगाम उपयोग के गंभीर दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। यही वजह है कि वह आजकल अपने लड़ाकों को साइबर ट्रेनिंग दे रहा है, ताकि सुरक्षा एजेंसियां उनके डिजिटल फुटप्रिंट्स को ट्रैक न कर सकें।
भारतीय खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इस्लामिक स्टेट अपने संदेशों को फैलाने के लिए 'वॉयस ऑफ खुरासान' नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहा है। बीते कुछ महीनों से इस प्लेटफॉर्म पर जो भी सामग्री शेयर की जा रही है, उसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचना है। इसके जरिये लड़ाकों को यह सिखाया जा रहा है कि कैसे एआई टूल्स का उपयोग कर के बिना अपनी पहचान उजागर किए सीक्रेट रिसर्च की जा सकती है।
'वॉयस ऑफ खुरासान' के एक हालिया लेख में साफ तौर पर आगाह किया गया है कि किसी भी संवेदनशील या खुफिया जानकारी को सामान्य चैटबॉट्स पर बिल्कुल भी शेयर न करें, क्योंकि जांच एजेंसियां इस डेटा के जरिए उन तक पहुंच सकती हैं। इसके विकल्प के रूप में इस्लामिक स्टेट ने अपने नेटवर्क को 'ब्रेव लियो' जैसे प्राइवेसी-केंद्रित एआई टूल्स का इस्तेमाल करने की सलाह दी है, जो उनकी गोपनीयता को बनाए रखते हैं। लेख में एक उदाहरण देते हुए लिखा गया है, "एआई की प्रकृति आग जैसी है, जिससे आप चाहें तो अपना घर रोशन कर सकते हैं और चाहें तो उसे राख भी कर सकते हैं।"
'एआई की प्रकृति आग जैसी है, जिससे आप चाहें तो अपना घर रोशन कर सकते हैं और चाहें तो उसे राख भी कर सकते हैं।' संगठन का पूरा ध्यान अब अपने लड़ाकों को 'जिम्मेदार' बनाने और डिजिटल दुनिया में कदम-कदम पर फूंक-फूंक कर पैर रखने पर है। आईएसआईएस ने अपने मुजाहिदीन से कहा है कि वे बाजार में मौजूद हर नई तकनीक से खुद को अपडेट रखें। लेख में आगाह किया गया है कि एआई आपके व्यवहार और आदतों को बहुत बारीकी से सीख सकता है, इसलिए हर हाल में साइबर-अवेयर रहना अनिवार्य है।
लड़ाकों को खुद डिजिटल साक्षर बनाने के साथ ही यह संगठन उन्हें इस बात के लिए भी उकसा रहा है कि वे अपने छोटे बच्चों को बचपन से ही तकनीक के दांव-पेच सिखाना शुरू कर दें। खुफिया ब्यूरो (IB) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह नई गाइडलाइन तब सामने आई है जब वैश्विक स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों ने तकनीक के जरिए इस्लामिक स्टेट के नेटवर्क को चारों तरफ से घेरना शुरू कर दिया है। अधिकारी के अनुसार, आतंकी आकाओं को यह समझ आ गया है कि उनके जमीनी कार्यकर्ता डिजिटल टूल्स का उपयोग करने में ढिलाई बरत रहे हैं, जिसके कारण उनके पकड़े जाने का खतरा बढ़ गया है। यही वजह है कि अब ऐसे साइबर सुरक्षा ट्यूटोरियल लगातार जारी किए जा रहे हैं।
यह बदलाव इस्लामिक स्टेट की पुरानी सोच में एक बड़ा यू-टर्न दिखाता है। पिछले साल तक यही संगठन एआई जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल को 'गैर-इस्लामिक' करार देता था। लेकिन आज, यह अपने समर्थकों को समझा रहा है कि एआई का उपयोग करना एक धार्मिक कर्तव्य है, और वे इसकी तुलना नमाज या हज जैसी पवित्र धार्मिक यात्राओं से करने लगे हैं।
सुरक्षा अधिकारियों का विश्लेषण है कि समय के साथ खुद को बदलने की यह खतरनाक प्रवृत्ति ही इस आतंकी संगठन को सबसे ज्यादा घातक और अभेद्य बनाती है। वे लगातार अपनी रणनीतियों को बदल रहे हैं और इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि जो तकनीक उनके लिए वरदान है, वही उनकी बर्बादी का सबब भी बन सकती है क्योंकि सुरक्षा एजेंसियां भी इसी तकनीक से उनका शिकार कर रही हैं।
अगर भारत के संदर्भ में बात करें, तो इस्लामिक स्टेट ने यहां अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। यह संगठन लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद की तरह पारंपरिक आतंकी मॉड्यूल या हथियारों के जरिए हमलों पर अपने संसाधन बर्बाद नहीं कर रहा है। इसका पूरा ध्यान सिर्फ ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और युवाओं का ब्रेनवॉश करने पर है। भारतीय इंटरनेट स्पेस में इस तरह के जहरीले कंटेंट को बड़े पैमाने पर परोसा जा रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को गुमराह किया जा सके। ( इनपुट: IANS)
Published on:
23 May 2026 03:10 pm
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