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पहचान भारत की, सियासत कनाडा की: कैसे स्थानीय राजनीति में मजबूत हुए भारतीय मूल के नेता

कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में भारतीय मूल के हर्षन रामदास और सुरिंदरपाल राठौर ने मेयर चुनाव में जीत हासिल की। जानिए दोनों नेताओं के चुनावी नतीजे और राजनीतिक सफर।
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भारत

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Anurag Animesh

•

Oct 20, 2026

Canada news

कनाडा में जीते भारतीय मूल के मेयर हर्षण रामदास और सुरिंदरपाल राठौर

Indian Origin Leaders in Canada: कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में हुए स्थानीय चुनावों में भारतीय मूल के दो नेताओं ने मेयर पद पर जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया है। भारत में जन्मे हर्षन रामदास फर्नी शहर के नए मेयर चुने गए हैं, जबकि सुरिंदरपाल राठौर ने विलियम्स लेक में दूसरी बार मेयर पद पर कब्जा जमाया है। दोनों नेताओं की जीत को कनाडा की स्थानीय राजनीति में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती भागीदारी के रूप में देखा जा रहा है।

फर्नी में रामदास को मिला मतदाताओं का भरोसा


फर्नी में मेयर पद के चुनाव में हर्षन ने अपने प्रतिद्वंद्वी काइल हैमिल्टन को 330 वोटों के अंतर से हराया। रामदास को 1,524, जबकि हैमिल्टन को 1,194 वोट मिले। जीत के बाद रामदास ने कहा कि शहर के लोगों ने आगे बढ़ने का स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने मतदाताओं का आभार जताते हुए सहयोग, जवाबदेही और शहर के हितों को प्राथमिकता देने का संकल्प व्यक्त किया।

राठौर ने दूसरी बार जीती मेयर की कुर्सी


विलियम्स लेक में सुरिंदरपाल राठौर ने अपनी लोकप्रियता बरकरार रखते हुए दूसरी बार मेयर पद पर जीत हासिल की। उन्हें 2,116 वोट मिले और उन्होंने वॉल्ट कॉब को एक हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया। राठौर ने जीत के बाद अपने परिवार, चुनाव अभियान में जुटी टीम और शहर के नागरिकों का धन्यवाद किया।

1974 में भारत से कनाडा पहुंचे थे राठौर

राठौर का राजनीतिक सफर संघर्ष और लंबे अनुभव से जुड़ा रहा है। वह 1974 में महज 21 वर्ष की उम्र में भारत से कनाडा पहुंचे थे। इसके करीब दो दशक बाद, 1993 में उन्होंने विलियम्स लेक की नगर परिषद का चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक पार्षद के रूप में अपनी सेवाएं दीं। नगर परिषद में लंबे अनुभव के बाद वर्ष 2022 में वह पहली बार शहर के मेयर चुने गए। हालांकि, उनकी राजनीतिक राह हमेशा आसान नहीं रही। वर्ष 2014 और 2018 के चुनावों में उन्हें वॉल्ट कॉब के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद उन्होंने राजनीतिक प्रयास जारी रखे। इस बार मिली जीत ने उनके राजनीतिक सफर को नई मजबूती दी है और लंबे समय से स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहे राठौर की स्थिति को और मजबूत किया है।