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पडोसी मुल्क नेपाल का बड़ा ऐलान: प्रधानमंत्री बालेन शाह मांगेंगे दलितों से माफी, सदियों पुराने भेदभाव पर ऐतिहासिक कदम

Nepal Dalit Apology: नेपाल सरकार ने दलित समुदाय से औपचारिक माफी मांगने का ऐलान किया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के इस फैसले को सदियों पुराने भेदभाव पर ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

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भारत

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Rahul Yadav

Apr 01, 2026

Nepal PM Balen Shah Dalit apology

Nepal PM Balen Shah Dalit apology (Image: ANI)

Nepal Dalit Apology: नेपाल सरकार ने सामाजिक न्याय की दिशा में एक अहम और ऐतिहासिक कदम उठाने का संकेत दिया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में सरकार ने दलित समुदाय से औपचारिक माफी मांगने की घोषणा की है। यह फैसला सदियों से चले आ रहे जाति आधारित भेदभाव को स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

100 दिन की योजना में शामिल बड़ा फैसला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह कदम सरकार की 100-दिवसीय शासन सुधार योजना का हिस्सा है। इसके तहत अगले दो हफ्तों में एक व्यापक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी है, जिसका उद्देश्य सामाजिक समावेशन, ऐतिहासिक मेल-मिलाप और न्याय को बढ़ावा देना है।

सरकार का मानना है कि इस पहल से दलित समुदाय के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करने और उनके अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक बदलाव आएगा।

दलित समुदाय की क्या प्रतिक्रिया?

दलित समुदाय से जुड़े संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि केवल माफी काफी नहीं होगी। दलित समाज विकास मंच की अध्यक्ष ने कहा कि ''राज्य की तरफ से औपचारिक माफी हमारे जख्मों पर मरहम का काम करेगी, लेकिन हमें हमारे अधिकारों की गारंटी और उनका सही क्रियान्वयन भी चाहिए।'' उन्होंने जोर देकर कहा कि असली बदलाव तभी संभव है जब दलितों को बराबरी और सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिले।

आंकड़ों में दलित समुदाय की स्थिति

नेपाल की करीब 3 करोड़ आबादी में दलित समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 13% है। इसके बावजूद सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर उनकी स्थिति कमजोर बनी हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, संसद में दलितों का प्रतिनिधित्व सीमित है और बड़ी संख्या में लोग अब भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं।

कानून बने, लेकिन जमीनी हकीकत अलग

नेपाल ने 2006 में खुद को अछूत-मुक्त राष्ट्र घोषित किया था। इसके बाद 2011 में जाति आधारित भेदभाव को अपराध बनाया गया और 2015 के संविधान में दलितों के अधिकारों को शामिल किया गया। इसके बावजूद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जमीनी स्तर पर भेदभाव अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की यह पहल एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ ठोस कदम उठाना भी जरूरी है। उनका कहना है कि यदि माफी के साथ-साथ आर्थिक सहायता, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, तभी इसका वास्तविक असर देखने को मिलेगा।