
डॉलर (Representational Photo)
पश्चिमी देशों में जब दक्षिणपंथी राजनीति, अप्रवासन का विरोध और इस्लामोफोबिया जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया पर भयंकर बहस छिड़ती है, तो ज़्यादातर लोगों को लगता है कि यह उनके अपने देश के लोगों की आवाज़ है। हालांकि हाल ही में आई एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका (United States of America), ऑस्ट्रेलिया (Australia) और कई देशों की कट्टरपंथी राजनीति को हवा देने वाले कई बड़े सोशल मीडिया ग्रुप्स को इंडोनेशिया (Indonesia) के छोटे-छोटे गांवों में बैठे 'बज़र' (Buzzer) चला रहे हैं।
इन लोगों को न तो विदेशी राजनीति (Foreign Politics) की समझ है और न ही इस बात से फर्क पड़ता है कि उस देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कौन है। उनका मकसद सिर्फ कंटेंट से होने वाली कमाई है, जो सोशल मीडिया के मोनेटाइज़ेशन प्रोग्राम से मिलती है।
इंडोनेशिया में 'बज़र' उन सोशल मीडिया हैंडल्स को कहा जाता है जो सोशल मीडिया पर किसी खास मुद्दे का 'बज़' (शोर) पैदा करते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग सिर्फ क्लिक, व्यू और सोशल मीडिया के मोनेटाइज़ेशन से कमाई के लिए काम करते हैं। इस व्यवस्था में बड़ी संख्या में छोटे अकाउंट्स मिलकर फर्जी ट्रेंड्स चलाते हैं।
भारत (India) में भी राजनीतिक बहस या आंदोलन का बड़ा हिस्सा सोशल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर होता है। ऐसे में वायरल पोस्ट के पीछे कौन है, उसकी मंशा क्या है और वह किस आर्थिक मॉडल से काम कर रहा है, यह सवाल तेज़ी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। हाल में मेटा (Meta) की ग्लोबल टीम को केंद्र सरकार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वो सिर्फ अपनी 'ग्लोबल नीतियों' के आधार पर भारत में काम नहीं कर सकते, उन्हें भारतीय कानूनों का सख्ती से पालन करना होगा।
यह पूरा फर्जीवाड़ा सोशल मीडिया के उस इंसेंटिव स्ट्रक्चर की वजह से फल-फूल रहा है, जो क्रिएटर्स को उनकी पोस्ट पर मिलने वाले इंगेजमेंट यानी लाइक्स, कमेंट्स, शेयर्स के आधार पर पैसे देता है। सोशल मीडिया ने सिर्फ वर्ष 2025 में ही रील्स, फोटो और टेक्स्ट पोस्ट्स के लिए दुनिया भर के क्रिएटर्स को ज़बरदस्त फायदा पहुंचाया है। इस मोटी रकम को बटोरने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर युवा इस 'साइबर आर्मी' का हिस्सा बन रहे हैं।
Updated on:
11 Aug 2026 03:04 am
Published on:
11 Aug 2026 03:03 am
